Saturday, 30 May 2026

ब्राह्मणों के सरनेम और उपाधियाँ ज्ञान और गोत्र के अनुसार

वैदिक काल और प्राचीन इतिहास में इन उपनामों की उत्पत्ति ज्ञान, वेदों के अध्ययन, और धार्मिक कर्तव्यों के आधार पर हुई थी। ये उपाधियां धीरे-धीरे सरनेम में बदल गई । लगता है कि समय के साथ- साथ ब्राह्मणों की ये उपाधियाँ वंशानुगत हो गयीं। इसका कारण सम्भवतः यह था कि वेदों व अन्य शास्त्रों के अध्ययन की परम्परा विरल हो गयी और गुणहीन लोग अपने पूर्वजों की उपाधियों के आधार पर आदर पाना पसन्द करने लगे। आजकल ब्राह्मणों की इन उपाधियों का इन्हें धारण करने वालों से कोई भी सामंजस्य नहीं रह गया है। 

A- वेदों के ज्ञान एवं कार्यों के आधार पर नाम:-

द्विवेदी (या दुबे): जिन्हें दो वेदों (जैसे ऋग्वेद और यजुर्वेद) का पूर्ण ज्ञान प्राप्त था, उन्हें द्विवेदी कहा गया।

त्रिवेदी/तिवारी (या त्रिपाठी): जिन्हें तीन वेदों का कंठस्थ ज्ञान और विशेषज्ञता हासिल थी।

चौबे (या चतुर्वेदी): जिन्हें चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, और अथर्ववेद) का संपूर्ण ज्ञान था, उन्हें चौबे या चतुर्वेदी की उपाधि मिली। 

शर्मा: यह संस्कृत शब्द 'शर्मन' से बना है, जिसका अर्थ होता है "सुख, शांति या कल्याण"। प्राचीन काल से ही ब्राह्मणों को अपने नाम के आगे अथवा पीछे '' लगाने का विधान रहा है।

पांडेय (या पण्डित/पाण्डे): यह शब्द 'पंडित' या 'पांडित्य' से विकसित हुआ है। इसका अर्थ होता है "विद्वान या शिक्षक", जो शास्त्रों और अध्यापन के कार्य से जुड़े थे।

मिश्रा (या मिश्र): इसका शाब्दिक अर्थ "मिश्रण या श्रेष्ठ" होता है। प्राचीन समय में जो विद्वान ज्ञान की विभिन्न शाखाओं (जैसे वेद, दर्शन, और कर्मकांड) में पारंगत थे, उन्हें 'मिश्र' कहा गया।

शुक्ल- पुराने समय में शुक्ल यजुर्वेद के जो विद्वान होते थे उन्हें शुक्ल कहते थे। आजकल के कुछ ब्राह्मणों की ‘शुक्ला’ उपाधि का उसी से सम्बन्ध है।

उपाध्याय- पुराने समय में जो ब्राह्मण वेद, उपनिषद आदि का अध्ययन छात्रों को कराते थे उन्हें उपाध्याय कहा जाता था।

 ओझा- 'ओझा' और 'झा' जैसे सरनेम उपाध्याय का ही अपभ्रंश रूप हैं।

अग्निहोत्री- अग्निहोत्री वे लोग थे जो हवन और अग्नि से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों के विशेषज्ञ थे ।

पाठक - पाठक वेदों का पाठ करने में निपुण थे । 

जोशी- जोशी सरनेम ज्योतिष विद्या से जुड़ा है. ये लोग नक्षत्रों, ग्रहों और खगोलीय गणनाओं के जानकार थे । 

दीक्षित- दीक्षित वे थे जो दीक्षा देने या ज्ञान प्रदान करने में माहिर थे । 

उद्देश्य: इसका उद्देश्य समाज में व्यक्ति के पेशा, पद, या ज्ञान के स्तर को पहचानना था।

  

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 भारतीय समाज, विशेषकर ब्राह्मण परंपरा में, पारंपरिक सरनेम उपाधि (Traditional Title Surname) और गोत्र उपाधि (Gotra Title) दो पूरी तरह से अलग व्यवस्थाएँ हैं। अक्सर लोग इन दोनों को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन इनके अर्थ, उद्देश्य और नियम भिन्न हैं। 

B- गोत्र के आधार पर उपाधि (Gotra Title)

गोत्र का सीधा संबंध वंश, रक्त (Bloodline), और जींस (Genetics) से है। यह एक व्यक्ति की जैविक और आध्यात्मिक जड़ों को दर्शाता है।

उत्पत्ति: गोत्र की उत्पत्ति प्राचीन काल के ब्रह्मा जी के चार मानसपुत्रों और सप्तऋषियों (जैसे भारद्वाज, कश्यप, वशिष्ठ, गौतम, अत्रि, विश्वामित्र, जमदग्नि) और अगस्त्य ऋषियों से हुई है। आप जिस ऋषि के वंशज हैं, वही आपका गोत्र है।

बदलाव: गोत्र को कभी बदला नहीं जा सकता। यह जन्म से तय होता है और पिता से पुत्र में हस्तांतरित होता है (सिर्फ महिलाओं का गोत्र विवाह के बाद पति के गोत्र में बदलता है)।उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य सगोत्र विवाह (एक ही गोत्र में शादी) को रोकना है, ताकि आनुवंशिक बीमारियाँ (Genetic disorders) न हों।

उदाहरण: अंगिरा, भारद्वाज, कश्यप, शांडिल्य, वत्स्य, कौंडिन्य, पराशर, गर्ग, गौतम।

ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों के नाम पर ही मूल गोत्रों की स्थापना हुई है। हिंदू धर्मग्रंथों और पुराणों के अनुसार, ब्रह्मा जी के मुख्य 10 मानस पुत्रों (जो ऋषि और प्रजापति बने) के नाम और उनके गोत्र निम्नलिखित हैं ।

ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और उनके गोत्र

मरीचि: मरीचि गोत्र (इन्हीं के पुत्र महर्षि कश्यप से 'कश्यप गोत्र' चला, जिसे सबसे बड़ा गोत्र समूह माना जाता है)।

अत्रि: अत्रि गोत्र।

अंगिरस (अंगिरा): अंगिरस गोत्र (इन्हीं के वंश से आगे चलकर 'भारद्वाज गोत्र' भी निकला)।

पुलस्त्य: पुलस्त्य गोत्र।

पुलह: पुलह गोत्र।

क्रतु: क्रतु गोत्र (इनके वंशज बालखिल्य कहलाए, इनकी कोई पारंपरिक मानव वंशावली आगे नहीं बढ़ी)।

भृगु: भार्गव या भृगु गोत्र।

वशिष्ठ: वशिष्ठ गोत्र।

दक्ष: दक्ष गोत्र।

नारद: नारद जी आजीवन ब्रह्मचारी रहे, इसलिए इनसे कोई वंश या गोत्र आगे नहीं बढ़ा।

गोत्र के आधार पर सरनेम और कर्म और ज्ञान आधार पर  मिली उपाधियों में मुख्य अंतर  (Difference): 

🔹"गोत्र का नाम" जन्म से मृत्यु तक अपरिवर्तनीय है। 

🔹ज्ञान आधारित "उपाधि सरनेम" पूर्वजों के काम या राजकीय सम्मान से बदलता था।

🔹एक ही गोत्र (सगोत्र) में विवाह वर्जित (शादी नहीं हो सकती)।जबकि एक ही सरनेम में विवाह संभव है (यदि गोत्र अलग हो)।

🔹गोत्र परम्परा का उद्देश्य है कि अनुवांशिक शुद्धता (Genetics) बनी रहे। यह प्रकृति और वंशानुक्रम (Ancestry) से तय होता है।

🔹जबकि ज्ञान आधारित "उपाधि सरनेम" समाज, राजा या शिक्षा संस्थान द्वारा दिया जाता था।

👉एक व्यावहारिक उदाहरण से समझें

मान लीजिए दो व्यक्ति हैं: 

रमेश मिश्रा (गोत्र: भारद्वाज)

सुरेश पाठक (गोत्र: भारद्वाज)

यहाँ दोनों का सरनेम (मिश्रा और पाठक) अलग है, क्योंकि उनके पूर्वजों के काम अलग थे। लेकिन उनका गोत्र एक ही है (भारद्वाज)। इसका मतलब है कि वे दोनों प्राचीन काल में एक ही ऋषि की संतानें हैं और आपस में भाई-भाई हुए। इसलिए, सरनेम अलग होने के बावजूद भी इनका आपस में विवाह नहीं हो सकता।इसके विपरीत, यदि दो व्यक्तियों का सरनेम 'मिश्रा' है, लेकिन एक का गोत्र 'कश्यप' है और दूसरे का 'शांडिल्य', तो उनका आपस में विवाह हो सकता है, क्योंकि उनका रक्त संबंध अलग है।

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साभार: ओमप्रकाश शर्मा, भरनाकलां (गोवर्धन, मथुरा) 

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Saturday, 23 May 2026

ओमप्रकाश शर्मा एक भाषा प्रेमी और स्वसमाज प्रेमी, भरनाकलाँ (गोवर्धन/मथुरा)

ओमप्रकाश शर्मा जी की ब्रजभाषा, विश्वभाषा और भारतीय भाषाओं के प्रति, और स्वसमाज की संस्कृति के प्रति गहरी श्रद्धा है।





A:- ओमप्रकाश शर्मा (Oman Saubhari Bhurrak/ ओमन सौभरि भुर्रक) को उनके डिजिटल कार्यों और ब्लॉग के आधार पर एक सच्चा भाषाप्रेमी (Language Lover / Linguistic Enthusiast) कहा जा सकता है, क्योंकि वे भारतीय भाषाओं और बोलियों को सहेजने और उन्हें बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं। 

उनके भाषा प्रेमी होने के मुख्य प्रमाण निम्नलिखित हैं:

1. बहुभाषी शैक्षिक मंच का संचालन

ओमप्रकाश शर्मा जीफेसबुक पेज Learn Indian Languages And Scripts नामक एक सक्रिय माइक्रो ब्लॉग चलाते हैं, जिसका एकमात्र उद्देश्य विभिन्न भाषाओं और उनकी लिपियों को लोगों के लिए आसान बनाना है।

2. हिंदी के माध्यम से क्षेत्रीय भाषाएं सिखाना

ओमप्रकाश शर्मा जी ने हिंदी भाषियों को देश की अन्य आधिकारिक भाषाओं से जोड़ने के लिए अनूठी पहल की है। उनके ब्लॉग पर निम्नलिखित भारतीय भाषाओं को हिंदी के माध्यम से सिखाने की समर्पित श्रेणियां (Categories) हैं ।

🔹उत्तर और पूर्व भारतीय भाषाएं: हिंदी, बंगाली, पंजाबी, उड़िया, संस्कृत, कश्मीरी और उर्दू आदि।

🔹पश्चिम भारतीय भाषाएं: गुजराती और मराठी, कोंकणी आदि ।

🔹दक्षिण भारतीय भाषाएं: तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम आदि।

3. स्थानीय और लुप्त होती बोलियों का संरक्षण

अक्सर लोग मुख्यधारा की भाषाओं पर ध्यान देते हैं, लेकिन ओमप्रकाश शर्मा ने हिंदी की उप-भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों को भी सहेजने का काम किया है। उनके ब्लॉग पर ब्रजभाषा (ब्रज की बोली) के पाठ, व्याकरण और बातचीत के तरीके संकलित हैं। हरियाणवी, बुंदेली, अवधी, बघेली और कन्नौजी जैसी समृद्ध लोक बोलियों के बारे में जानकारी दी गई है।

4. दैनिक उपयोग की शब्दावली का निर्माण

ओमप्रकाश शर्मा जी ने आम लोगों के लिए भाषाओं को व्यावहारिक बनाने के लिए रोज़मर्रा की चीज़ों का अनुवाद और शब्दकोश तैयार किया है। उदाहरण: ब्रजभाषा ग्रीटिंग्स , ब्रजभाषा में रसोई के सामानों के नाम, सगे-संबंधियों (रिश्तेदारों) के नाम, दिन, महीनों और ऋतुओं के नाम आदि।

5. वैश्विक और जनजातीय भाषाओं में रुचि

भारतीय भाषाओं के अलावा, उनके मंच पर तिब्बती (Tibetan) और स्पेनिश (Spanish) जैसी विदेशी भाषाओं को भी हिंदी के माध्यम से सीखने के बुनियादी संसाधन उपलब्ध हैं।

6. भारतीय एवं विश्व भाषाओं के प्रति उनका "दृष्टिकोण और सपना" दोनों से प्रेम:

 वे अपने ब्लॉग पर भारतीय भाषाओं और उनकी लिपियों (जैसे देवनागरी, बंगाली, गुरुमुखी आदि) का विस्तृत ज्ञान साझा करते हैं। इसके साथ ही, वे वैश्विक स्तर पर भाषाओं और लेखन प्रणालियों के प्रसिद्ध मार्गदर्शक मंच 'Omniglot' को भी फॉलो करते हैं। उनका मुख्य सपना व मूल उद्देश्य हिन्दी भाषा को एक सशक्त माध्यम बनाकर लोगों को "विश्व और भारत की विभिन्न भाषाओं व लिपियों" से परिचित कराना है। वे चाहते हैं कि भाषाई बाधाएँ दूर हों और लोग सहजता से नई भाषाएँ सीख सकें। भाषाई विविधता का संरक्षण: वे भारत की समृद्ध भाषाई विरासत और लिपियों के phonetic base (ध्वन्यात्मक आधार) को आम लोगों तक सरल भाषा में पहुँचाना चाहते हैं

👉निष्कर्ष: किसी भी व्यक्ति का इतनी सारी भाषाओं, उनकी वर्णमालाओं (Alphabets) और स्थानीय बोलियों की शब्दावली को एक जगह संकलित करना उनके गहरे भाषाई ज्ञान और भाषाओं के प्रति उनके निस्वार्थ प्रेम को दर्शाता है।

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उनके ब्रजभाषा प्रेमी होने के मुख्य प्रमाण निम्नलिखित हैं:

B:- ओमप्रकाश शर्मा जी (ओमन सौभरि भुर्रक) का नाम और उनका व्यक्तित्व पूरी तरह से ब्रजभूमि की सेवा में समर्पित है। ब्लॉग और कार्यों के आधार पर एक सच्चा ब्रजभाषा प्रेमी कहा जा सकता है। उनके ब्रजभाषा और ब्रजसंस्कृति के प्रति प्रेम को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

1. ब्रज क्षेत्र के तीर्थों और इतिहास का दस्तावेजीकरण: 

उन्होंने अपने ब्लॉग के माध्यम से सूरजकुंड, गांव भरनाखुर्द (SurajKund, Village BharanaKhurd) के समृद्ध इतिहास और धरोहर को संजोया है तथा  सूरजकुंड के किनारे स्थित सूर्यनारायण मंदिर, सिद्धबाबा मंदिर जैसी धरोहरों के बारे में विस्तार से लिखा है, जो ब्रज मंडल का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

2. ब्रज के संतों और लोक-कथाओं के प्रति अगाध श्रद्धा

उन्होंने अपने लेखन में ब्रजभूमि के सिद्ध संतों का उल्लेख किया है। उदाहरण के लिए, उन्होंने गांव भरनाखुर्द में राधारानी की कृपा प्राप्त सिद्धबाबा मधुसूदन दास जी महाराज और पं. आनंद कृष्ण जी महाराज के प्रसंगों को लिपिबद्ध किया है। यह दर्शाता है कि वे ब्रज की भक्ति परंपरा और संस्कृति से गहराई से जुड़े हुए हैं। अहिवासी ब्राह्मणों में पुरोहित वर्ग को गहरा स्थान दिया है क्योंकि उनके माध्यम से शास्त्रों को और शास्त्रों में निहित ज्ञान साधारण लोगों तक पहुंच पाता है।

3. ब्रज संस्कृति और जड़ों से जुड़ाव उनकी सोशल मीडिया और ब्लॉग प्रोफाइल: 

(जैसे omansaubhari.wordpress.com) से साफ पता चलता है कि वे खुद को मथुरा-गोवर्धन के भरना कलां (काका जी परिवार अथवा गैया बाबा परिवार (Old Family Name) से जोड़ते हैं।

 ब्लॉग 'भारत भाषाकोश' (Bharat Bhashakosh) के लेखक ओमप्रकाश शर्मा (Oman Saubhari Bhurrak) भारतीय भाषाओं और विश्व की भाषाओं दोनों से ही बेहद गहरा प्रेम करते हैं।आपके द्वारा किया गया अनुमान बिल्कुल सटीक है । उनके ब्लॉग और गतिविधियों से उनके सपने और रुचि के बारे में यह बातें स्पष्ट होती हैं ।

4. ब्रज संस्कृति और लोकभाषा का उत्थान: वे मथुरा (ब्रजमंडल) से जुड़े होने के कारण ब्रजभाषा, स्थानीय लोकगीतों, सांस्कृतिक परंपराओं और धार्मिक स्थानों  आदि का गहराई से प्रचार-प्रसार करते हैं।

 

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उनके स्वसमाज प्रेमी होने के मुख्य प्रमाण निम्नलिखित हैं:

C:- ओमप्रकाश शर्मा जी (पंडित ओमन सौभरि भुर्रक) की सबसे बड़ी विशेषता अपने लुप्त होते समाज के इतिहास और वंशावली को डिजिटल माध्यमों से पुनर्जीवित करना है।उनकी प्रमुख विशेषताओं को नीचे दिए गए बिंदुओं में समझा जा सकता है:

ओमप्रकाश शर्मा जी (पंडित ओमन सौभरि भुर्रक) उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित भरनाकलां (गोवर्धन) गाँव के एक शोधकर्ता, लेखक और सौभरि ब्राह्मण समाज के प्रमुख इतिहासकार हैं। उनके बारे में मुख्य बातें नीचे दी गई हैं:

🔹इतिहास और वंशावली संकलन: 

इन्होंने प्राचीन हिंदू ग्रंथों, उपनिषदों और पुराणों का अध्ययन करके ब्रह्मर्षि सौभरि जी और उनके वंशज अहिवासी सौभरि ब्राह्मण समाज के इतिहास, गोत्रों, उपगोत्रों तथा गांवों की सूचियों को संकलित किया है। 

🔹ब्रह्मर्षि सौभरि कोष का निर्माण: उन्होंने आदिगौड़ सौभरेय अहिवासी सौभरि ब्राह्मण समाज के इतिहास को समेटते हुए एक विस्तृत स्वसमाज ज्ञानकोश तैयार किया है। इसमें समाज का गोत्र और सभी 50 उपगोत्रों/अवंटकों और उनके मूल गांवों की सटीक वंशावली मौजूद है।

🔹डिजिटल योगदान एवं संरक्षण : वे इंटरनेट और सोशल मीडिया (जैसे Saubhari Brahman Blog और Oman Saubhari WordPress) के माध्यम से अपने समाज की सांस्कृतिक विरासत, पौराणिक कथाओं और ब्रजभाषा लोकगीतों को सहेजने का काम करते हैं।

  जब समाज की युवा पीढ़ी अपने मूल इतिहास को भूल रही थी, तब उन्होंने Saubhari Brahman Blog और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करके इस प्राचीन ज्ञान को इंटरनेट पर सहेजा। आज कोई भी व्यक्ति उनके माध्यम से अपनी पारिवारिक जड़ों और गोत्रों को आसानी से खोज सकता है।

🔹👍निशुल्क समाज सेवा: इतिहास संकलन का यह विशाल कार्य वे किसी व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से समाज सेवा और अपनी प्राचीन संस्कृति के प्रति समर्पण के भाव से कर रहे हैं। संक्षेप में कहें तो, वे " आदिगौड़ अहिवासी सौभरेय ब्राह्मण समाज के आधुनिक डिजिटल इतिहासकार" हैं, जिन्होंने कलम और इंटरनेट के माध्यम से अपने स्वसमाज की पहचान को नई पीढ़ी के लिए सुरक्षित कर दिया है।

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साभार: ओमप्रकाश शर्मा, भरनाकलां (गोवर्धन, मथुरा) 

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Monday, 16 February 2026

ब्रह्मर्षि सौभरि वंशजों (अहिवासी ब्राह्मणों) के १२ गांवों में होली पर आयोजित होने वाले मेलों की तिथियां

 ब्रह्मर्षि सौभरि वंशजों (अहिवासी ब्राह्मणों) के १२ गांवों में होली पर आयोजित होने वाले मेलों का विवरण:-

विश्व के अन्य सभी देशों की तुलना में “भारत” वास्तव में आज भी गांवों का ही देश है। कला, संस्कृति, वेशभूषा के आधार पर आज भी ‘गांव’ देश की रीढ़ की हड्डी बने हुये हैं। प्रत्येक गांव का एक अपना ही महत्व होता है जिसका पता वहां रहने वाला ही जानता है। गांव में चक्की (चाखी) के मधुरगीत से ही सवेरा आरंभ होता है।

होली पर इन मेलों में रंग-गुलाल, लोक संगीत, ढोल-नगाड़े, पारंपरिक व्यंजनों और अनूठी क्षेत्रीय परंपराओं के साथ उमंग भरा माहौल होता है, जो सामुदायिक एकता व उल्लास को दर्शाता है ।

 मेलों/त्योहारों की तिथियां:- होली का त्योहार भारतीय उपमहाद्वीप की विभिन्न हिंदू परंपराओं में सांस्कृतिक महत्व रखता है। यह अतीत की गलतियों को भुलाकर उनसे मुक्ति पाने, दूसरों से मिलकर संघर्षों को समाप्त करने और भूलकर क्षमा करने का उत्सव है। लोग ऋण चुकाते हैं या क्षमा करते हैं, साथ ही अपने जीवन में नए सिरे से संबंध स्थापित करते हैं। 

होली वसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक है, जो लोगों को बदलते मौसम का आनंद लेने और नए मित्र बनाने का अवसर प्रदान करती है। होली का ब्रज क्षेत्र में विशेष महत्व है , जिसमें राधा कृष्ण से जुड़े पारंपरिक स्थान शामिल हैं : मथुरा , वृंदावन , नंदगाँव , बरसाना और गोकुल, दाऊजी , गोवर्धन आदि। होली के दौरान ये सभी स्थान लोकप्रिय पर्यटन स्थल हैं।

हिंदू पंचांग चंद्र-सौर है, लेकिन अधिकांश त्योहारों की तिथियां चंद्र पंचांग के भाग के अनुसार निर्धारित की जाती हैं। चंद्र दिवस को तीन विशिष्ट पंचांग तत्वों द्वारा पहचाना जाता है वो हैं मास, पक्ष और तिथि।



१:बिजवारी- फाल्गुन शुक्ल षष्ठी (छठ)

२:नगरिया - फाल्गुन शुक्ल द्वादशी 

३:खानपुर - फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी (चौदस)

४:डाहरौली - फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी (चौदस)

५:भरनाकलां - चैत्र कृष्ण प्रथमा (परवा)

६:भदावल - चैत्र कृष्ण प्रथमा ((परवा)

७:भरनाखुर्द -चैत्र कृष्ण द्वितीया (दियोज)

८:मघेरा - चैत्र कृष्ण द्वितीया (दियोज)

९:पलसौं- चैत्र कृष्ण तृतीया (तीज़)

१०: पेलखू - चैत्र कृष्ण तृतीया (तीज़)

११:सीह - चैत्र कृष्ण चतुर्थी (चौथ)

१२:खायरा - चैत्र कृष्ण पंचमी (पाँचें/रंगपंचमी


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मथुरा जिले के अंतर्गत आने वाले स्वसमाज के 12 गांवों का परिचय गोवर्धन, छाता/मथुरा तहसील


Monday, 3 March 2025

विष्णुपुराण के अनुसार ब्रह्मर्षि सौभरि जी की कथा

ब्रह्मर्षि सौभरि वर्णन- श्रीविष्णुमहापुराणे चतुर्थांशो! द्वितीयोऽध्यायः २



श्रीपराशर उवाच - 

यावच्च ब्रह्मलोकात्स ककुद्मी रैवतो नाभ्येति तावत्पुण्यजनसंज्ञा राक्षसास्तामस्य पुरीं कुशस्थलीं नजघ्नुः १

तच्चास्य भ्रातृशतं पुण्यजनत्रासाद्दिशो भेजे २

तदन्वयाश्च क्षत्रियास्सर्वदिक्ष्वभवन् ३

वृष्टस्यापि वार्ष्टकं क्षत्त्रमभवत् ४

नाभागस्यात्मजो नाभागसंत्रोभवत् ५

तस्याप्यंबरीषः ६

अंबरीषस्यापि विरूपोभवत् ७

विरूपात्पृषदश्वो जज्ञे ८

ततश्च रथीतरः ९

अत्रायं श्लोकः

एते क्षत्रप्रसूता वै पुनश्चांगिरसाः स्मृताः

रथीतराणां प्रवराः क्षत्त्रोपेता द्विजातयः इति १०

क्षुतवतश्च मनोरिक्ष्वाकुः पुत्रो जज्ञे घ्राणतः ११

तस्य पुत्रशतप्रधाना विकुक्षिनिमिदंडाख्यास्त्रयः पुत्रा बभूवुः १२

शकुनिप्रमुखाः पंचाशत्पुत्राः उत्तरापथरक्षितारो बभूवुः १३

चत्वारिंशदष्टौ च दक्षिणापथभूपालाः १४

स चेक्ष्वाकुरष्टकायाश्श्राद्धमुत्पाद्य श्राद्धार्हं मांसमानयेति विकुक्षिमाज्ञापयामास १५

स तथेति गृहीताज्ञो विधृतशरासनो वनमभ्येत्यानेकशो मृगान् हत्वा श्रांतोतिक्षुत्परीतो विकुक्षिरेकं शशमभक्षयत्

श्षॐ च मांसमानीय पित्रे निवेदयामास १६

इक्ष्वाकुकुलाचार्यो वशिष्ठस्तत्प्रोक्षणाय चोदितः प्राह

अलमनेनामेध्येनामिषेण दुरात्मना तव पुत्रेणैतन्मांसमुपहतं यतोऽनेन शशो भक्षितः १७

ततश्चासौ विकुक्षिर्गुरुणैवमुक्तश्शशादसंज्ञामवाप पित्रा च परित्यक्तः १८

पितर्युपरते चासावखिलामेतां पृथ्वीं धर्मतश्शाशास १९

शशादस्य तस्य पुरंजयोनाम पुत्रोभवत् २०

तस्येदं चान्यत् २१

पुरा हि त्रेतायां देवासुरयुद्धमतिभीषणमभवत् २२

तत्र चातिबलिभिरसुरैरमराः पराजितास्ते भगवंतं विष्णुमाराधयांचक्रुः २३

प्रसन्नश्च देवानामनादिनिधनोखिलजगत्परायणो नारायणः प्राह २४

ज्ञातमेतन्मया युष्माभिर्यदभिलषितं तदर्थमिदं श्रूयताम् २५

पुरंजयो नाम राजर्षेश्शशादस्य तनयः क्षत्त्रियवरो यस्तस्य शरीरेहमंश्नो स्वयमेवावतीर्य तानश्षोआ!नसुरान्निहनिष्यामि तद्भवद्भिः पुरंजयोऽसुरवधार्थमुद्योगं कार्यतामिति २६

एतच्च श्रुत्वा प्रणम्य भगवंतं विष्णुममराः पुरंजयसकाशमाजग्मुरूचुश्चैनम् २७

भोभोः क्षत्त्रियवर्यास्माभिरभ्यर्थितेन भवतास्माकमरातिवधोद्यतानां कर्तव्यं साहाय्यमिच्छामः तद्भवतास्माकमभ्यागतानां प्रणयभंगो न कार्य इत्युक्तः पुरंजयः प्राह २८

त्रैलोक्यनाथो योयं युष्माकमिंद्र ः! शतक्रतुरस्य यद्यहं स्कंधाधिरूढो युष्माकमरातिभस्सह योत्स्ये तदहं भवतां सहायः स्याम् २९

इत्याकर्ण्य समस्तदेवैरिंद्रे ण च बाढमित्येवं समन्विच्छितम् ३०

ततश्च शतक्रतोर्वृषरूपधारिणः ककुदि स्थितोऽतिरोषसमन्वितो भगवतश्चराचरगुरोरच्युतस्य तेजसाप्यायितो देवासुरसंग्रामे समस्तानेवासुरान्निजघान ३१

यतश्च वृषभककुदि स्थितेन राज्ञा दैतेयबलं निषूदितमतश्चासौ ककुत्स्थसंज्ञामवाप ३२

ककुत्स्थस्याप्यनेनाः पुत्रोऽभवत् ३३

पृथुरनेनसः ३४

पुथोर्विष्टराश्वः ३५

तस्यापि चांद्रो युवनाश्वः ३६

चांद्र स्य तस्य युवनाश्वस्य शावस्तः यः पुरीं शावस्तीं निवेशयामास ३७

शावस्तस्य बृहदश्वः ३८

तस्यापि कुवलयाश्वः ३९

योसावुदकस्य महर्षेरपकारिणं दुंदुनामानमसुरं वैष्णवेन तेजसाप्यायितः पुत्रसहस्रैरेकविंशद्भिः परिवृतो जघान दुंदुमारसंज्ञामवाप ४०

तस्य च तनयास्समस्ता एव दुंदुमुखनिश्वासाग्निना विप्लुष्टा विनेशुः ४१

दृढाश्वचंद्रा श्वकपिलाश्वाश्च त्रयः केवलं शो!षिताः ४२

वृढाश्वाद्धर्यश्वः ४३

तस्माच्च निकुंभः ४४

निकुंभस्यामिताश्वः ४५

ततश्च कृशाश्वः ४६

तस्माच्च प्रसेनजित् ४७

प्रसेनजितो युवनाश्वोभवत् ४८

तस्य चापुत्रस्यातिनिर्वेदान्मुनीनामाश्रममंडले निवसतो दयालुभिर्मुनिभिरपत्योत्पादनायेष्टः कृता ४९

तस्यां च मध्यरात्रौ निवृत्तायां मंत्रपूतजलपूर्णं कलशं वेदिमध्ये निवेश्य ते मुनयः सुषुपुः ५०

सुप्तेषु तेषु अतीव तृट्परीतस्स भूपालस्तमाश्रमं विवेश ५१

सुप्तांश्च तानृषीन्नैवोत्थापयामास ५२

तच्च कलशमपरिमेयमाहात्म्यमंत्रपूतं पपौ ५३

प्रबुद्धाश्च ऋषयः पप्रछुः केनैतं मंत्रपूतं वारि पीतम् ५४

अत्र हि राज्ञो युवनाश्वस्य पत्नी महाबलपराक्रमं पुत्रं जनयिष्यति

इत्याकर्ण्ये स राजा अजानता मया पीतमित्याह ५५

गर्भश्च युवनाश्वस्योदरे अभवत्क्रमेण च ववृधे ५६

प्राप्तसमयश्च दक्षिणांगुष्ठेन कुक्षिमवनिपतेर्निर्भिद्य निश्चक्राम ५७

स चासौ राजा ममार ५८

जातो नामैष कं धास्यतीति ते मुनयः प्रोचुः ५९

अथागत्य देवराजोब्रवीत् मामयं धास्यतीति ६०

ततो माधातृनामा सोभवत्

वक्त्रे चास्य प्रदेशिनी न्यस्ता देवेंद्रे ण न्यस्तातां पपौ ६१

तां चामृतस्राविणीमास्वाद्याह्नैव स व्यवर्द्धत ६२

ततस्तु मांधाता चक्रवर्त्ती सप्तद्वीपां महीं वुभुजे ६३

तत्रायं श्लोकः ६४

यावत्सूर्य उदेत्यस्तं यावच्च प्रतितिष्ठति

सर्वं तद्यौवनाश्वस्य मांधातुः क्षेत्रमुच्यते ६५

मांधाता शतबिंदोर्दुहितरं बिंदुमतीमुपयेमे ६६

 पुरुकुत्समंबरीषं मुचुकुंदं च तस्यां पुत्रत्रयमुत्पादयामास ६७

पंचाशद्दुहितरस्तस्यामेव तस्य नृपतेर्बभूवुः ६८

एकस्मिन्नंतरे बह्वृचश्च सौभरिर्नाम महर्षिरंतर्जले द्वादशाब्दं कालमुवास ६९ तत्र चांतर्जले संमदो नामातिबहु- प्रजोतिमात्रप्रमाणो मीनाधिपतिरासीत् ७०

तस्य च पुत्रपौत्रदौहित्राः पृष्ठतोऽग्रतः पार्श्वयोः पक्षपुच्छशिरसां चोपरि भ्रमंतस्तेनैव सदाहर्निशमतिनिर्वृत्ता रेमिरे ७१

स चापत्यस्पर्शोपचीयमानप्रहर्षप्रकर्षो बहुप्रकारं तस्य ऋषेः पश्यतस्तैरात्मजपुत्रपौत्रदौहित्रादिभिः सहानुदिनं सुतरां रेमे ७२

अथांतर्जलावस्थितस्सौभरिरेकाग्रतस्समाधिमपहायानुदिनं तस्य सत्स्यस्यात्मजपुत्रपौत्रदौहित्रादिभिस्सहातिरमणीयतामवेक्ष्याचिंतयत् ७३

अहो धन्योयमीदृशमनभिमतं योन्यंतरमवाप्यैभिरात्मजपुत्रपौत्रदौहित्रादिभिस्सह रममाणोतीवास्माकं स्पृहामुत्पादयति ७४

वयमप्येवं पुत्रादिभिस्सह ललितं रमिष्याम इत्येवमभिकांक्षन् स तस्मादंतर्जलान्निष्क्रम्य संतानाय निवेष्टुकामः कन्यार्थं मांधातारं राजानमगच्छत् ७५

🥀🌻आगमनश्रवणसमनन्तरं चोत्थाय तेन राज्ञा सम्यगर्घ्यादिना संपूजितः कृतासनपरिग्रहः सौभरिरुवाच राजानम् ७६

सौभरिरुवाच

निवेष्टुक्

आमोऽस्मिनरेन्द्र कन्यां प्रयच्छ मे मा प्रणयं विभांक्षीः

न ह्यर्थिनः कार्यवशादुपेताः ककुत्स्थवंशो! विमुखाः प्रयांति ७७

अन्येपि संत्येव नृपाः पृथिव्यां मांधातरेषां तनयाः प्रसूताः

किं त्वर्थिनामर्थितदानदीक्षाकृतव्रतश्लाघ्यमिदं कुलं ते ७८

शतार्धसंख्यास्तव संति कन्यास्तासां ममैकां नृपते प्रयच्छ

यत्प्रार्थनाभंगभयाद्बिभेमि तस्मादहं राजवरातिदुःखात् ७९

श्रीपराशर उवाच

इति ऋषिवचनमाकर्ण्य स राजा जराजर्जरितदेहमृषिमालोक्य प्रत्याख्यानकातरस्तस्माच्च शापभीतो बिभ्यत्किंचिदधोमुखश्चिरं दध्यौ च ८०

सौभरिरुवाच

नरेंद्र कस्मात्समुपैषि चिंतामसह्यमुक्तं न मयात्र किंचित्

यावश्यदेया तनया तयैव कृतार्थता नो यदि किं न लब्धा ८१

श्रीपराशर उवाच

अथ तस्य भगवतश्शापभीतस्सप्रश्रयस्तमुवाचासौ राजा ८२

राजोवाच

भगवन् अस्मत्कुलस्थितिरियं य एव कन्याभिरुचितोऽभिजनवान्वरस्तस्मै कन्या प्रदीयते भगवद्याच्ञा चास्मन्मनोरथानामप्यतिगोचरवर्त्तिनी कथमप्येषा संजाता तदेवमुपस्थिते न विद्मः किं कुर्म इत्येतन्मयाऽचिंत्यत इत्यभिहिते च तेन भूभुजा मुनिरचिंतयत् ८३

अयमन्योऽस्मत्प्रत्याख्यानोपायो वृद्धोयमनभिमतः स्त्रीणां किमत कन्याकानामित्यमुना संचिंत्यैतदभिहितमेवमस्तु तथा करिष्यामीति संचिंत्य मांधातारमुवाच ८४

यद्येवं तदादिश्यतामस्माकं प्रवेशाय

कंन्यांतःपुरं वर्षवरो यदि कन्यैव काचिन्मामभिलषति तदाहं दारसंग्रहं करिष्यामि अन्यथा चेत्तदलमस्माकमेतेनातीतकालारंभणेनेत्युक्त्वा विरराम ८५

ततश्च मांधात्रा मुनिशापशं कितेन कन्यांतःपुरवर्षधरस्समाज्ञप्तः ८६

तेन सह कन्यांतःपुरं प्रविशन्नेव भगवानखिलसिद्धगंधर्वेभ्योतिशयेन कमनीयं रूपमकरोत् ८७

प्रवेश्य च तमृषिमंतःपुरे वर्षधरस्ताः कन्याः प्राह ८८

भवतीनां जनयिता महाराजस्समाज्ञापयति ८९

अयमस्मान् ब्रह्मर्षिः कन्यार्थं समभ्यागतः ९०

मया चास्य प्रतिज्ञातं यद्यस्मत्कन्या या काचिद्भगवंतं वरयति तत्कन्याच्छंदे नाहं परिपंथानं करिष्यामीत्याकर्ण्य सर्वा एव ताः कन्याः सानुरागाः सप्रमदाः करेणव इव मृगयूथपतिं तमृषिमहमहमिकया वरयांबभूवुरूचुश्च ९१

अलं भगिन्योहमिमं वृणोमि वृणोम्यहं नैष तवानुरूपः

ममैष भर्त्ता विधिनैव सृष्टस्सृष्टाहमस्योपशमं प्रयाहि ९२

वृतो मयायं प्रथमं मयायं गृहं विशन्नेव विहन्यसे किम्

मया मयोतिक्षितिपात्मजानां तदर्थमत्यर्थकलिर्बभूव ९३

यदा मुनिस्ताभिरतीवहार्दाद्वृतस्स कन्याभिरनिंद्यकीर्तिः

तदा स कन्याधिकृतो नृपाय यथावदाचष्ट विनम्रमूर्त्तिः ९४

श्रीपराशर उवाच

तदवगमात्किंकिमेतत्कथमेतत्किं किं करोमि किं मयाभिहितमित्याकुलमतिरनिच्छन्नपि कथमपि राजानुमेने ९५

कृतानुरूपविवाहश्च महर्षिस्सकला एव ताः कन्यास्स्वमाश्रममनयत् ९६

तत्र चाऽशेषशिल्पकल्पप्रणेतारं धातारमिवान्यं विश्वकर्माणमाहूय सकलकन्यानामेकैकस्याः प्रोत्फुल्लपंकजाः कूजत्कलहंसकारंडवादिविहंगमाभिरामजलाशयास्सोपधानाः

सावकाशास्साधुशय्यापरिच्छदाः प्रासादाः क्रियंतामित्यादिदेश ९७

तच्च तथैवानुष्ठितमश्षोशिल्पविशेषाचार्यस्त्वष्टा दर्शितवान् ९८

ततः परमर्षिणा सौभरिणाज्ञप्तस्तेषु गृहेष्वनिवार्यानंदकुंदमहानिधिरासांचक्रे ९९

ततोऽनवरतेन भक्ष्यभोज्यलेह्याद्युपभोगैरागतानुगतभृत्यादीनहर्निशमश्षोगृहेषु ताः क्षितीशदुहितरो भोजयामासुः १००

एकदा तु दुहितृस्नेहाकृष्टहृदयस्स महीपतिरतिदुःखितास्ता उत सुखिता वा इति विचिंत्य तस्य महर्षेराश्रमसमीपमुपेत्य स्फुरदंशुमालाललामां स्फटिकमयप्रासादमालामतिरम्योपवनजलाशयां ददर्श १०१

प्रविश्य चैकं प्रासादमात्मजां परिष्वज्य कृतासनपरिग्रहः प्रवृद्धस्नेहनयनांबुगर्भनयनोब्रवीत् १०२

अप्यत्र वत्से भवत्यास्सुखमुत किंचिदसुखमपि ते महर्षिस्स्नेहवानुत न स्मर्यतेस्मद्गृहवास इत्युक्ता तं तनया पितरमाह १०३

तातातिरमणीयः प्रासादोत्रातिमनोज्ञमुपवनमेते कलवाक्यविहंगमाभिरुताः प्रोत्फुल्लपद्माकरजलाशयाः मनोनुकूलभक्ष्यभोज्यानुलेपनवस्त्रभूषणादिभोगो मृदूनि शयनासनानि सर्वसंपत्समेतं मे गार्हस्थ्यम् १०४

तथापि केन वा जन्मभूमिर्न स्मर्यते १०५

त्वत्प्रसादादिदमश्षोमतिशोभनम् १०६

किं त्वेकं ममैतद्दुःखकारणं यदस्मद्गृहान्महर्षिरयम्मद्भर्त्ता न विष्क्रामति ममैव केवलमतिप्रीत्या समीपपरिवर्त्तिनीनामन्यासामस्मद्भगिनीनाम् १०७

एवं च मम सोदर्योतिदुःखिता इत्येवमतिदुःखकारणमित्युक्तस्तया द्वितीयं प्रासादमुपेत्य स्वतनयां परिष्वज्योपविष्टस्तथैव पृष्टवान् १०८

तयापि च सर्वमेतत्तत्प्रासादाद्युपभोगसुखं भृशमाख्यातं ममैव केवलमतिप्रीत्या पार्श्वपरिवर्त्तिनीनामन्यासामस्मद्भगिनीनामित्येवमादिश्रुत्वा समस्तप्रासादेषु राजा प्रविवेश तनयां तनयां तथैवावृच्छत् १०९

सर्वाभिश्च ताभिस्तथैवाभिहितः परितोषविस्मयनिर्भरविवशहृदयो भगवंतं सौभरिमेकांतावस्थितमुपेत्य कृतपूजोब्रवीत् ११०

दृष्टस्ते भगवन् सुमहानेष सिद्धिप्रभावो नैवंविधमन्यस्य कस्यचिदस्माभिर्विभूतिभिर्विलसितमुपलक्षितं यदेतद्भगवतस्तपसः फलमित्यभिपूज्य तमृषिं तत्रैव तेन ऋषिवर्येण सह किंचित्कालमभिमतोपभोगान् बुभुजे स्वपुरं च जगाम १११

कालेन गच्छता तस्य तासु राजतनयासु पुत्रशतं सार्धमभवत् ११२

अनुदिनानुरूढस्नेहप्रसरश्च स तत्रातीवममताकृष्टहृदयोऽभवत् ११३

अप्येतेऽस्मत्पुत्राः कलभाषिणः पद्भ्यां गच्छेयुः अप्येते यौवनिनो भवेयुः अपि कृतदारानेतान् पश्येयमप्येषां पुत्रा भवेयुः अप्येतत्पुत्रान्पुत्रसमन्वितान्पश्यामीत्यादिमनोरथाननुदिनं कालसंपत्तिप्रवृद्धानुपेक्ष्यैतच्चिंतयामास ११४

अहो मे मोहस्यातिविस्तारः ११५

मनोरथानां न समाप्तिरस्ति वर्षायुतेनाप्यथ वापि लक्षैः

पूर्णेषुपूर्णेषु मनोरथानामुत्पत्तयस्संति पुनर्नवानाम् ११६

पद्भ्यां गता यौवनिनश्च जाता दारैश्च संयोगमिताः प्रसूताः

दृष्टाः सुतास्तत्तनयप्रसूतिं द्र ष्टुं पुनर्वांच्छति मेंऽतरात्मा ११७

द्र क्ष्यामि तेषामिति चेत्प्रसूतिं मनोरथो मे भविता ततोन्यः

पुर्णेपि तत्राप्यपरस्य जन्म निवार्यते केन मनोरथस्य ११८

आमृत्युतो नैव मनोरथानामंतोस्ति विज्ञातमिदं मयाद्य

मनोरथासक्तिपरस्य चित्तं न जायते वै परमार्थसंगि ११९

स मे समाधिर्जलवासमित्रमत्स्यस्य संगात्सहसैव नष्टः

परिग्रहस्संगकृतो मयायं परिग्रहोत्था च ममातिलिप्सा १२०



साभार: पंडित ओमन सौभरि भुर्रक, मथुरा (उत्तर प्रदेश) ।

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Wednesday, 20 November 2024

अखिल भारतीय सौभरि वंशज (अहिवासी ब्राह्मण) समाज गाँवों विवरण-

 अखिल भारत में सौभरि ब्राह्मण समाज गाँवों की संख्या का विवरण-




जिला मथुरा (उत्तर प्रदेश) यमुना के आर वाले गांव-
1.खानपूर 2.भदावल 3. नगरिया 4.खायरा 5. बिजवारी 6.डाहरौली 7.सीह 8.पलसों 9. भरनाकलां 10.भरनाखुर्द 11.पेलखू 12.मघेरा 13- सुनरख 
यमुना के पार वाले जिला अलीगढ़, हाथरस, आगरा (उत्तर प्रदेश)
1.दिहौली 2.मलिकपुरा 3.आलमपुर 4.भांकरी 5.सोनोठ 6.अलीपुर 7.मड्राक 8.नगला अहिवासी 9.तिलौठी10. भोजगढ़ी11, पेठागांव 12. सासनी12.कोड़ा 13, जटौआ 14. महासिंह का नगला 15.हाथी की गढ़ी 16- दाऊजी 
गंगा पार के गांव बरेली (उत्तर प्रदेश)-
1.खुर्द नबाबपुरा 2.सुकटिया 3.पृथ्वीपुर4.पिपरिया वीरपुर 5.चंद्रपुरा 6.सीतापुर 7. 8.केशरपुर 9.जगन्नाथपुर 10.बारशेर 11.दलीपुर 12.हरदासपुर 13.माहमूडपुर 14.चकरपुर 15.गोटिया
बदायूँ (उत्तर प्रदेश)-
1.भोजपुर,2.गुरयारी
जिला सीतापुर उत्तर प्रदेश-
1-अहिवासी पुरवा 2- टेडवा चेलावला3- निभा ढेरा 4- भकरी कला 5-
 पकरिया6- गौरा अर्जुनपुर 7- खजुरिया अहिवासी 8- पिपरावा 9- भदसिया10- कलापुर 11- उमरिया 12-परसेहरामल जिला-जालौन, ओखलेपुरा ।

अलवर जिला में आने वाले गांव (राजस्थान)-
1. बदनगढ़ी 2. गारु 3.नगला सीताराम 4.नगला खूबा 5.नगला केसरी 6.नतौज 7.लाठकी 8. भोजपुरा 9. अर्र्रूआ 10.सामौली 11.रामनगर 12. बालूपुरा 13.खैर मेडा, करीले का नगला 
भरतपुर जिला (राजस्थान)-
1. नयावास 2. मनोहरपुर 3. जहांगीरपुर 4. सितारा 5. अजयपुरा 6. बिसदे 7. सैंथरी 8. डीग 9. कुम्हेर 10. मूंडिया 11. पड़लवास 12. कुरकेंन 13.सरसई 14. उसरारौ 15.सिकरोरी  
भिंड जिला (मध्यप्रदेश)
1.काठा 2.रारी 3.मछर्या 4.बन्थारी 5.बिरखडी 6.मिहोना 7.चंडौंक 8.छिडी 9.बोहरा 10.शिकारपुरा 11.कौनरपुरा 12.अहिवासियों का पुरा 13.सोनी 14.महाराजपुरा 15.जगन्नाथपुरा 16.सीताराम की लवण 17.बिरखडी डांग 18.पिपडी 19.नौनेरा 20.खेरिया चदन 21.खेरिया बेर 22.तरौली 23.बरौली 24.भिंड
ग्वालियर जिला (मध्यप्रदेश)-
1. रंगवन
जबलपुर जिला (मध्यप्रदेश) –
1.डिढोरा 2.उड़ना 3.भोरडा 4.मेढी 5.अमरपुर 6.खेड़ा 7.पथरोरा 8.पाटन 9.जटवा 10.जूरी 11.जूरीखुर्द 12.कटरा बेलखेड़ा 13.कौनरपुर
14.पथरिया 15.चंडवा 16 मेहंगवा17 सिंगौरी 18.राइयाखेड़ा 19.नोनी 20 खामदेही 21.भेड़ाघाट 22.शाहपुरा 23.बामनोढा 24.सुरई 25.भरदा 26.कुआखेड़ा 27.मेली 28.पिंडराई 29.गुबरा
30.जमखार 31.बेलखेड़ा बड़ा 32.कूड़ा 33.झालोंन 34.बदराई 35- सुनाचर
नरसिंहपुर जिला (मध्यप्रदेश)-
1.गातेगाँव श्रीधाम 2.बगलाइ 3.कोरेगांव 4 चांडाली 5.करेली
हरदा जिला (मध्यप्रदेश)- 1.हरदा 2. ऊडा 3.भाटरपेटिया 4.डोलरिया 5.टेमागांव 6.झाडबीड़ा 7.झिरिखेड़ा 8.घोघडामाफी9. बंदीमुहाड़िया10.सिराली 11.टिमरनी 12.गोंदागांवकलां 13.सुरजना 14.रनहाई
आगर जिला(मध्यप्रदेश)
1.आगर मालवा 2.बडागाँव
शाजापुर जिला (मध्यप्रदेश)
1.पोलायकला
शिहोड़ जिला (मध्यप्रदेश)
1.नसरुल्लागंज 2.मन्झली 3.बीरखेडी
होशंगाबाद जिला (मध्यप्रदेश)-
1. होशंगाबाद
2.सिवनी मालवा
विदिशा (मध्यप्रदेश)-
1.विदिशा 2. गंजबासोदा
Total- 160 से ज्यादा गांव हैं ।
साभार: पंडित ओमन सौभरि भुर्रक, गाँव-भरनाकलां, गोवर्धन, मथुरा(उत्तर प्रदेश) ।

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Monday, 7 October 2024

स्वसमाज के सभी गांवो की जानकारी इन मानकों के अनुसार

 गांव का परिचय 

क्षेत्रफल 

जनसंख्या 

समाज/वर्ग

शिक्षा 

घरों की संख्या 

स्कूल/कॉलेज

बैंक 

हॉस्पिटल 

मन्दिर 

ग्राम्य देवी 

ग्राम्य देवता/भूमिया 

तालाब/पोखर 

नहर 

बंबा/बंबी 

गांव के प्रधानों के नाम 

कुआ 

भाषा 

पहनावा 

खान- पान 

व्यापार/कृषि की फसलें

गांव का मेला/रीति -रिवाज 

गांव के प्रसिद्द जन

 गांव के थोक अथवा सैक्टर

गांव की पाग 

गांव में स्वसमाज के गोत्रों की संख्या

वीकली मार्केट

 गांव की धर्मशाला 

रामलीला कमेटी


साभार: पंडित ओमन सौभरि भुर्रक, गाँव-भरनाकलां, गोवर्धन, मथुरा(उत्तर प्रदेश) ।

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ब्रह्मर्षि सौभरि वंशज (अहिवासी ब्राह्मण समाज) में भात , विवाह, छोछक आदि की प्रचलित परंपराएं

 👉 कुछ रीति रिवाज इस तरह से हैं -

सनातन धर्म में सद्गृहस्थ (परिवार निर्माण) की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है।विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है। दो प्राणी अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह कोई शारीरिक या सामाजिक अनुबन्ध मात्र नहीं हैं, यहाँ दाम्पत्य को एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना का भी रूप दिया गया है। इसलिए कहा गया है 'धन्यो गृहस्थाश्रमः'। सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं।

अतएव पति-पत्नी को एक-दूसरे से आकर्षण लाभ मिलने की बात न सोचकर एक-दूसरे के प्रति आत्म-समर्पण करने और सम्मिलित शक्ति उत्पन्न करने, उसके जीवन विकास की सम्भावनाऐं उत्पन्न करने की बात सोचनी चाहिए। चुनाव करते समय तक साथी को पसन्द करने न करने की छूट है। जो कुछ देखना, ढूँढ़ना, परखना हो, वह कार्य विवाह से पूर्व ही समाप्त कर लेना चाहिए। जब विवाह हो गया, तो फिर यह कहने की गुंजाइश नहीं रहती कि भूल हो गई, इसलिए साथी की उपेक्षा की जाए। जिस प्रकार के भी गुण-दोष युक्त साथी के साथ विवाह बन्धन में बँधें, उसे अपनी ओर से कर्त्तव्यपालन समझकर पूरा करना ही एक मात्र मार्ग रह जाता है। इसी के लिए विवाह संस्कार का आयोजन किया जाता है। समाज के सम्भ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कर्तव्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और समझाएं ।

▪️बिचौलिए के सहायता से विवाह के लिए लड़का ढूढना

▪️लडकी दिखाना 

▪️गोद भराई/रोका /मंगनी 

▪️लग्न/भेंट - लग्न पत्रिका औपचारिक सगाई समारोह और जोड़े की आसन्न शादी की घोषणा है। इस दौरान, युगल एक लिखित वचन का आदान-प्रदान करते हैं जिसमें कहा जाता है कि विवाह समारोह उनके द्वारा चुनी गई तारीख को बाद में होगा। समारोह में शादी की तारीख और समय को अंतिम रूप दिया जाता है, जिसमें आमतौर पर एक हिंदू पुजारी होता है, जिसे पंडित के रूप में भी जाना जाता है, जो विवाह का विवरण और इसमें शामिल सभी परिवार के सदस्यों के नाम लिखता है। यह हिंदू विवाह रिवाज विशेष दिन(दिनों) से महीनों पहले किया जाता है।

▪️भात न्यौतना

▪️तेल उबटन 

▪️ लडकी वालों के यहां मेंहदी रचाई - मेहंदी समारोह दुल्हन के परिवार द्वारा आयोजित किया जाता है और आम तौर पर शादी से एक या दो दिन पहले होता है।" "इस परंपरा से दुल्हन को शादीशुदा जीवन की शुरुआत में सौभाग्य और अच्छी सेहत मिलने की उम्मीद की जाती है। मेहंदी पार्टी दुल्हन के लंच के समान है और दुल्हन के जीवन में महत्वपूर्ण महिलाओं के लिए इकट्ठा होने, सलाह और यादें साझा करने और बंधन बनाने का एक शानदार तरीका है। पारंपरिक मेहंदी समारोह में केवल महिला परिवार के सदस्य शामिल होते हैं ।

▪️मांडा 

▪️भात पहनाई

▪️बारात

जग बारात का न्यौता 

निकासी

बसों द्वारा प्रस्थान 

लडकी वाले गांव में प्रवेश 

धूरगोला संकेत 

बारात की चढ़ाई 

नाश्ता/पानी 

लड़के का गांव की किसी लडकी या बहिन - बेटी द्वारा स्वागत 

जनवासे पर ठहराव 

लडकी के घर पर पहली बार लड़के का प्रवेश 

खांड कटोरा 

दहेज 

मिलनी 

दोबारा जानवासे पर 

बारात का खाना 

बारात को दक्षिणा 

सींक 

बारात की विदाई 

वरमाला के लिए कन्या का आगमन - दूल्हे के विवाह में प्रवेश करने और तिलक लगाकर स्वीकार करने के बाद, कन्या आगमन के दौरान दुल्हन प्रवेश करती है। कन्या आगमन हिंदी में "लड़की के आगमन" या "दुल्हन के आगमन" के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है। दुल्हन के जुलूस के दौरान, होने वाली दुल्हन अक्सर फूलों की चादर के नीचे चलती है, एक चादर जो आमतौर पर फूलों से सजी होती है जो दुल्हन को उसके परिवार की सुरक्षा छोड़कर अपने दूल्हे के पास जाने का प्रतीक है, जिसे उसके भाई पकड़ते हैं। प्रियजन, अक्सर दुल्हन की मौसी और चाचा, आम तौर पर जुलूस में शामिल होते हैं। इसके बाद जल्द ही दुल्हन को मंडप में ले जाया जाता है, जहाँ दूल्हा, उसके प्रियजन और पंडित बैठते हैं। वरमाला के दौरान, जिसे मिलनी माला या जय माला के नाम से भी जाना जाता है, जोड़े एक दूसरे को फूलों की माला पहनाते हैं। माला आमतौर पर चमकीले रंग के चमेली के फूलों, गुलाब या गेंदे के फूलों से बनी होती है। माला का आदान-प्रदान जोड़े द्वारा एक दूसरे को अपने परिवार में स्वीकार करने का प्रतीक है। जो लोग इस हिंदू विवाह अनुष्ठान को मज़ेदार बनाना चाहते हैं, वे यह देखने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं कि कौन पहले दूसरे व्यक्ति को माला पहना सकता है।

कन्यादान 

सप्तपदी अथवा लडका - लडकी के ७ फेरे - हिंदू विवाह समारोह का ग्रंथीबंधन वह हिस्सा है जब जोड़ा "शादी के बंधन में बंधता है।" इस रस्म के दौरान, दूल्हे का दुपट्टा दुल्हन के पल्लू या साड़ी से बांधा जाता है, जबकि वे देवताओं से प्रार्थना करते हैं कि उनका विवाह मज़बूत और स्वस्थ हो। दो कपड़ों को एक साथ बांधना जोड़े की आत्माओं को पवित्र विवाह के ज़रिए नए जीवन में एक साथ जुड़ने का प्रतिनिधित्व करता है। हिंदू विवाह रिवाज के दौरान, जोड़ा "पवित्र अग्नि के चारों ओर सात कदम उठाएगा, जिसे सात फेरे या सप्तपदी के नाम से भी जाना जाता है, ये हिंदू विवाह की शपथ हैं जो जोड़ा पवित्र अग्नि के चारों ओर चक्कर लगाते समय लेता है। प्रत्येक शपथ और कदम विवाह में एक चरण को दर्शाता है जिसका सामना जोड़ा करेगा। ये शपथ हिंदू/वैदिक अनुष्ठानों का हिस्सा हैं और इन्हें बहुत गंभीरता से लिया जाता है। ये शपथ दो आत्माओं के बीच मिलन को पवित्र बनाती हैं।"

जूता छुपाई - जूता छुपाई हिंदू विवाह की एक मज़ेदार जूता-संबंधी परंपरा है जिसे केशव ने हमारे लिए समझाया है। जब दूल्हा मंडप में पहुंचता है, तो उसे प्रवेश करने के लिए अपने जूते उतारने पड़ते हैं क्योंकि मंडप में सब कुछ पवित्र माना जाता है। यह दुल्हन की बहनों, चचेरी बहनों आदि (सभी महिलाओं) के लिए दूल्हे के जूते चुराने का सुनहरा अवसर होता है। जब तक वह महिलाओं को पैसे [या उपहार] नहीं देता, तब तक उसे अपने जूते वापस नहीं मिलेंगे ।

लडकी की विदाई 

▪️ लडकी का ससुराल में गृहप्रवेश /द्वार रोकाई

हिंदू विवाह की एक और मजेदार परंपरा है द्वार रोकाई। जब नया जोड़ा दूल्हे के घर पहुंचता है, तो दूल्हे की बहन को घर में उनके प्रवेश को रोकने का काम सौंपा जाता है। फिर दूल्हे को अपनी बहन को नकद या उपहार देकर घर में प्रवेश करना होता है।

दहलीज पुजाई 

मुँह दिखाई - स्वागत समारोह और उपहार मुंह दिखाई, "चेहरा दिखाने" की परंपरा के साथ जारी रहते हैं। मुंह दिखाई आमतौर पर शादी की रात घर पर होती है और तब परिवार की महिलाएं दुल्हन का चेहरा दिखाती हैं और उसे उपहार और मिठाइयाँ देती हैं। सास इसमें एक बड़ा हिस्सा होती है और दुल्हन को अपने नए परिवार के सामने अपना चेहरा "दिखाने" में मदद करती है।

देवता पूजवाना 

आंचलगांठ 

कढ़ाई खेल

चूल्हा पूजाई 

रिश्तेदारी में भोजन का निमंत्रण

▪️दशई 

▪️ विदाई - विदाई, जिसे बिदाई भी लिखा जाता है, हिंदू विवाह से जुड़ी सबसे भावनात्मक परंपराओं में से एक मानी जाती है। यह भव्य विदाई कब होगी यह परिवार की पसंद और मूल पर निर्भर करता है, लेकिन इसके चरण बहुत समान रहते हैं। बाहर निकलते समय, दुल्हन अपने माता-पिता की ओर बिना देखे पाँच बार चावल, फूलों की पंखुड़ियाँ और सिक्कों का मिश्रण फेंकती है। यह रस्म बेटी की अपने परिवार के प्रति कृतज्ञता को दर्शाती है और वर्षों से उनके द्वारा की गई दयालुता के लिए उन्हें वापस भुगतान करने का एक तरीका है। फेंकी गई वस्तुएँ धन और समृद्धि का प्रतीक हैं।

▪️ जैमौ, लड्डू/सकलपारे 

▪️ शोहगी 

▪️होली मेला

▪️छोछक/ कुआ पूजन


साभार: पंडित ओमन सौभरि भुर्रक, गाँव-भरनाकलां, गोवर्धन, मथुरा(उत्तर प्रदेश) ।

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Monday, 3 June 2024

माता के शक्तिपीठ व स्थानों के नाम

माता के शक्तिपीठ-

भारत भूमि तथा अन्य देशों में माता के शक्तिपीठों की संख्या व स्थान:- 



उत्तर प्रदेश राज्य- 

 मणिकर्णिका घाट, वाराणसी - यहां माता सती की मणिकर्णिका गिरी थी। यहां माता के विशालाक्षी और मणिकर्णी स्वरूप की पूजा होती है।

माता ललिता देवी शक्तिपीठ, प्रयागराज - इलाहाबाद स्थित इस जगह पर माता सती के हाथ की अंगुली गिरी थी। यहां माता ललिता के नाम से जानी जाती हैं। 

रामगिरी, चित्रकूट में माता सती का दायां स्तन गिरा था। इस स्थान पर माता शिवानी के रूप में पूज्यनीय हैं।

वृंदावन में उमा शक्तिपीठ स्थित है। इसे कात्यायनी शक्तिपीठ के नाम से भी जानते हैं। यहां माता के बाल के गुच्छ और चूड़ामणि गिरे थे।

देवी पाटन मंदिर, बलरामपुर में माता का बायां स्कंध गिरा था। इस शक्तिपीठ में माता मातेश्वरी के रूप में विराजमान हैं।

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बिहार- 

मिथिला शक्तिपीठ- भारत नेपाल सीमा पर माता सती का बायां कंधा गिरा था। यहां माता को देवी उमा कहा जाता है।

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 मध्यप्रदेश - 

 हरसिद्धि देवी शक्तिपीठ- मध्य प्रदेश में देवी के दो शक्तिपीठ हैं। इनमें से एक हरसिद्धी देवी शक्तिपीठ है, जहां माता सती की कोहनी गिरी थी। यह रूद्र सागर तालाब के पश्चिमी तट पर स्थित है।

 शोणदेव नर्मता शक्तिपीठ- मध्यप्रदेश के अमरकंटक में माता का दया नितंब गिरा था। यहां पर नर्मदा नदी का उद्गम होने के कारण यहां माता को नर्मता स्वरूप में पूजा जाता है।

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हिमाचल प्रदेश - 

नैना देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर में शिवालिक पर्वत पर देवी सती की आंख गिरी थी। यहां माता देवी महिष मर्दिनी कही जाती हैं। 

ज्वाला जी शक्तिपीठ-  हिमाचल के कांगड़ा में देवी की जीभ गिरी थी, इस कारण इसका नाम सिधिदा या अंबिका पड़ा।

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 पंजाब - 

त्रिपुरमालिनी माता शक्तिपीठ- पंजाब के जालंधर में छावनी स्टेशन के पास माता का बायां स्तर गिरा था। 

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जम्मू कश्मीर - 

 अमरनाथ के पहलगांव, कश्मीर में माता सती का गला गिरा था, यहां महामाया की पूजा होती है।

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हरियाणा - 

हरियाणा के कुरुक्षेत्र में माता के पैर की एड़ी गिरी थी। यहां माता सावित्री का शक्तिपीठ स्थित है।

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राजस्थान - 

मणिबंध- अजमेर के पुष्कर में गायत्री पर्वत पर माता सती की दो पहुंचियां गिरी थीं। यहां माता के गायत्री स्वरूप की पूजा की जाती है। 

बिरात- राजस्थान में माता अंबिका का मंदिर है। यहां माता सती के बाएं पैर की उंगलियां गिरी ।

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गुजरात - 

 अंबाजी मंदिर- गुजरात में माता अम्बाजी का मंदिर है। मान्यता है कि यहां माता का हृदय गिरा था।

गुजरात के जूनागढ़ में देवी सती का आमाशय गिरा था। यहां माता को चंद्रभागा के नाम से जाना जाता है।

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महाराष्ट्र - 

महाराष्ट्र के जनस्थान पर माता की ठोड़ी गिरी थी। उसके बाद यहां देवी के भ्रामरी स्वरूप की पूजा होने लगी। 

माताबाढ़ी पर्वत शिखर शक्तिपीठ त्रिपुरा में उदरपुर के राधाकिशोरपुर गांव में है। इस स्थान पर माता का दायां पैर गिरा था। यहां माता को देवी त्रिपुर सुंदरी कहलाती हैं।

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 पश्चिम बंगाल - 

यहां पूर्व मेदिनीपुर जिले के तामलुक स्थित विभाष में देवी कपालिनी का मंदिर है। यहां माता की बायीं एड़ी गिरी थी।

बंगाल के हुगली में रत्नावली में माता सती का दायां कंधा गिरा था। इस मंदिर में माता को देवी कुमारी नाम से पुकारा जाता है। 

 मुर्शीदाबाद के किरीटकोण ग्राम में देवी सती का मुकुट गिरा था। यहां माता का शक्तिपीठ है और माता के विमला स्वरूप की पूजा की जाती है।

जलपाइगुड़ी के बोडा मंडल में सालबाढ़ी गांव में माता का बायां पैर गिरा था। इस स्थान पर माता के भ्रामरी देवी के रूप की पूजा की जाती है।

बहुला देवी शक्तिपीठ- वर्धमान जिले के केतुग्राम इलाके में माता सती का बायां हाथ गिरा था। 

 मंगल चंद्रिका माता शक्तिपीठ - वर्धमान जिले के उज्जनि में माता का शक्तिपीठ है। यहां माता की दायीं कलाई गिरी थी। 

पश्चिम बंगाल के वक्रेश्वर में देवी सती का भ्रूमध्य गिरा था। इस स्थान पर माता को महिषमर्दिनी कहा जाता है। 

नलहाटी शक्तिपीठ- बीरभूम के नलहाटी में माता के पैर की हड्डी गिरी थी। 

 फुल्लारा देवी शक्तिपीठ- पश्चिम बंगाल के अट्टहास में माता सती के होंठ गिरे थे। यहां माता फुल्लारा देवी कहलाती हैं। 

नंदीपुर शक्तिपीठ- पश्चिम बंगाल में माता सती का हार गिरा था। यहां मां नंदनी की पूजा की जाती है। 

युगाधा शक्तिपीठ- वर्धमान जिले के ही क्षीरग्राम में माता के दायें हाथ का अंगूठा गिरा। इस स्थान पर माता का शक्तिपीठ बन गया, जहां उन्हें देवी जुगाड्या के नाम से पुकारा जाता है। 

कलिका देवी शक्तिपीठ-मान्यताओं के मुताबिक, कालीघाट में माता के दाएं पैर की अंगूठा गिरा था। वे मां कालिका के नाम से यहां जानी जाती हैं।

कांची देवगर्भ शक्तिपीठ- पश्चिम बंगाल के कांची में देवी की अस्थि गिरी थीं। यहां माता देवगर्भ रूप में स्थापित हैं।

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असम - 

 कामाख्या शक्तपीठ- प्रसिद्ध शक्तिपीठों में गुवाहाटी के नीलांतल पर्वत पर स्थित कामाख्या जी है। कामाख्या में माता की योनि गिरी थी। यहां माता के कामाख्या स्वरूप की पूजा होती है।

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दक्षिण भारत - 

तमिलनाडु -  

भद्रकाली शक्तिपीठ- तमिलनाडु में माता की पीठ गिरी थी। इस स्थान पर माता का कन्याश्रम, भद्रकाली मंदिर और कुमारी मंदिर स्थित है। उन्हें श्रवणी नाम से पुकारा जाता है।

शुचि शक्तिपीठ- तमिलनाडु में कन्याकुमारी के पास शुचि तीर्थम शिव मंदिर स्थित है। यहां भी माता का शक्तिपीठ है, जहां उनकी ऊपरी दाढ़ गिरी थी। माता को यहां नारायणी नाम मिली है। 

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उड़ीसा - 

 विमला देवी शक्तिपीठ- उड़ीसा के उत्कल में देवी की नाभि गिरी थी। यहां माता विमला नाम से जानी जाती हैं।

आंध्रप्रदेश - 

सर्वशैल रामहेंद्री शक्तिपीठ-आंध्र प्रदेश में दो शक्तिपीठ हैं। एक सर्वशैल रामहेंद्री शक्तिपीठ, जहां माता के गाल गिरे थे। इस स्थान पर भक्त माता के राकिनी और विश्वेश्वरी स्वरूप की पूजा करते हैं।

श्रीशैलम शक्तिपीठ-आंध्र में ही दूसरी शक्तिपीठ कुर्नूर जिले में है। श्रीशैलम शक्तिपीठ में माता सती के दाएं पैर की पायल गिरी थी। यहां माता श्री सुंदरी के नास में स्थापित हैं। 

कर्नाटक

 कर्नाटक शक्तिपीठ- कर्नाटक में देवी सती के दोनों कान गिरे थे। इस स्थान पर माता का जय दुर्गा स्वरूप पूज्यनीय है।

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भारत से बाहर शक्तिपीठ- 

बांग्लादेश - 

चट्टल भवानी शक्तिपीठ- बांग्लादेश के चिट्टागौंग जिले में चंद्रनाथ पर्वत पर चट्टल भवानी शक्तिपीठ है। यहां माता सती की दायीं भुजा गिरी थी।

सुगंधा शक्तिपीठ- बांग्लादेश के शिकारपुर से 20 किमी दूर माता की नासिका गिरी थी। इस शक्तिपीठ में माता को सुगंधा कहा जाता है। इस शक्तिपीठ का एक अन्य नाम उग्रतारा शक्तिपीठ है।

 जयंती शक्तिपीठ -बांग्लादेश के सिलहट जिले में जयंतिया परगना में माता की बाईं जांघ गिरी थी। यहां माता देवी जयंती नाम से स्थापित हैं।

श्रीशैल महालक्ष्मी -बांग्लादेश के सिलहट जिले में माता सती का गला गिला था। इस शक्तिपीठ में महालक्ष्मी स्वरूप की पूजा होती है।

यशोरेश्वरी माता शक्तिपीठ -बांग्लादेश के खुलना जिले में यशोर नाम की जगह है, जहां मां सती की बाईं हथेली गिरी थी।

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श्रीलंका - 

 इन्द्राक्षी शक्तिपीठ- श्रीलंका के जाफना नल्लूर में देवी की पायल गिरी ती। इस शक्तिपीठ को इन्द्राक्षी कहा जाता है। 

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नेपाल - 

 गुहेश्वरी शक्तिपीठ- नेपाल मे पशुपतिनाथ मंदिर से कुछ दूरी पर बागमती नदी के किनारे यह शक्तिपीठ है। यहां मां सती के दोनों घुटने गिरे थे। यहां शक्ति के महामाया या महाशिरा रूप की पूजा होती है।

आद्या शक्तिपीठ- नेपाल में गंडक नदी के पास आद्या शक्तिपीठ है। मान्यता है कि इस स्थान पर माता सती का बायां गाल गिरा था। यहां माता के गंडकी चंड़ी स्वरूप की पूजा होती है।

दंतकाली शक्तिपीठ- नेपाल के बिजयापुर गांव में माता सती के दांत गिरे थे। इस कारण इस शक्तिपीठ को दन्तकाली शक्तिपीठ के नाम से जाना जाता है।

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तिब्बत - 

 मनसा शक्तिपीठ- तिब्बत में मानसरोवर नदी के पास माता सती की दाईं हथेली गिरी थी। यहां उन्हें माता दाक्षायनी कहा जाता है। माता यहां एक शिला के रूप में स्थापित हैं। 

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पाकिस्तान

हिंगुलाज शक्तिपीठ- पाकिस्तान के बलूचिस्तान में देवी का हिंगुला शक्तिपीठ है। इस शक्तिपीठ में माता को हिंगलाज देवी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यहां माता सती का सिर गिरा था।


साभार: पंडित ओमन सौभरि भुर्रक, गाँव-भरनाकलां, गोवर्धन, मथुरा(उत्तर प्रदेश) ।

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Monday, 27 May 2024

आदिगौड़ सौभरेय अहिवासी ब्राह्मणों के अवंटक/उपगोत्र/अल्ल :-

 आदिगौड़ सौभरेय अहिवासी ब्राह्मणों के अवंटक/उपगोत्र/अल्ल :-




1- बादर

2- सोती (श्रोती) 

3- पचौरी

4-भाट (भटेले) 

5- पधान 

6- रतिवार 

7- गौदाने (गौदानी)

8- तगारे

9- दीगिया (दीक्षित)

10- नुक़्ते (बरगला)

11- भुर्रक 

12- रमैया

13- कुम्हेरिया

14- इटोईया

15- सीहइयाँ

16- सैंथरिया

17- बसइया

18- नदीसरिया 

19- बजरावत

20- परसैंया

21- करिया

22- नालौठिया

23- दुरकी

24- विहोन्याँ

25- ओखले

26- करौतिया

27- मुडिनिया

28- गागर

29- डामर

30- गलवले

 31- छिरा

32- जयन्तिया

33- डिड्रोइया

 34- तैसिये 

35- दुर्गवार

36- दिरहरे 

37- अझैयां

 38- नायक

 39- उमाड़िया

40- कांकर

41- रौसरिया

42- औगन

43- सिरौलिया

44- पलावार (पल्हा) 

45- सिकरोरिया

 46- रमैया

47-गलजीते 

48- किलकिले 

49- तागपुरिया

 50- काठ


साभार-  ओमन सौभरि भुरर्क, भरनाकलां, मथुरा

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साभार:- ओमन ब्रजवासी 


ब्रजभाषा सीखिए

ब्रज के भोजन और मिठाइयां

ब्रजभूमि का सबसे बड़ा वन महर्षि 'सौभरि वन'

ब्रज मेट्रो रूट व घोषणा

ब्रजभाषा कोट्स 1

ब्रजभाषा कोट्स 2

ब्रजभाषा कोट्स 3

ब्रजभाषा ग्रीटिंग्स

ब्रजभाषा शब्दकोश

आऔ ब्रज, ब्रजभाषा, ब्रज की संस्कृति कू बचामें

ब्रजभाषा लोकगीत व चुटकुले, ठट्ठे - हांसी

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Thursday, 2 May 2024

राष्ट्रीय पुष्प कमल की महिमा

 कमल भारत का राष्ट्रीय पुष्प है। संस्कृत में कमल के अन्य नाम हैं - पद्म, पंकज, पंकरुह, सरसिज, सरोज, सरोरुह, सरसीरुह, जलज, जलजात, नीरज, वारिज, अंभोरुह, अंबुज, अंभोज, अब्ज, अरविंद, नलिन, उत्पल, पुंडरीक, तामरस, इंदीवर, कुवलय, वनज आदि आदि। 



भारत की पौराणिक गाथाओं में कमल का विशेष स्थान है। पुराणों में ब्रह्मा को विष्णु की नाभि से निकले हुए कमल से उत्पन्न बताया गया है और लक्ष्मी को पद्मा, कमला और कमलासना कहा गया है। चतुर्भुज विष्णु को शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाला माना जाता है। भारतीय मंदिरों में स्थान-स्थान पर कमल के चित्र अथवा संकेत पाए जाते हैं। भगवान्‌ बुद्ध की जितनी मूर्तियाँ मिली हैं, प्राय: सभी में उन्हें कमल पर आसीन दिखाया गया है। क्योंकि कमल बिना किसी दाग ​​के कीचड़ से उगते हैं, इसलिए उन्हें अक्सर पवित्रता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। कमल का पौधा उगाने के लिये मानसून का मौसम सबसे अच्छा रहता है, क्योंकि बारिश के बीच कमल के पौधे अच्छे से ग्रो कर जाते हैं ।


▪️पद्मालयां पद्मकरां पद्मपत्रनिभेक्षणाम्

     वन्दे पद्ममुखीं देवीं पद्मनाभप्रियाम्यहम्॥

अर्थ - विष्णु पुराण में इन्द्र द्वारा लक्ष्मी की स्तुति करते हुए कहा गया है- कमल के आसन वाली, कमल जैसे हाथों वाली, कमल के पत्तों जैसी आँखों वाली, हे पद्म (कमल) मुखी, पद्मनाभ (भगवान विष्णु) की प्रिय देवी, मैं आपकी वन्दना करता हूँ।

▪️एक पुराण का नाम ही पद्म पुराण है, ऐसा कहा जाता है कि पदम का अर्थ है-‘कमल का पुष्प’। चूंकि इसमें सृष्टि रचयिता ब्रह्माजी ने भगवान नारायण के नाभि कमल से उत्पन्न होकर सृष्टि-रचना संबंधी ज्ञान का विस्तार किया था, इसलिए इस पुराण को पदम पुराण की संज्ञा दी गई है।

▪️ महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित सभी अठारह पुराणों की गणना में ‘पदम पुराण’ को द्वितीय स्थान प्राप्त है। श्लोक संख्या की दृष्टि से भी इसे द्वितीय स्थान रखा जाता है।

▪️भारत की राजधानी दिल्ली में बने बहाई उपासना मंदिर का स्थापत्य पूरी तरह से खिलते हुए कमल के आकार पर आधारित है जिसके कारण इसे लोटस टेंपल भी कहते हैं।

▪️संस्कृत - सलिले हंस हसे कमलम् कमले तिष्ठति सरस्वति।

हिंदी अनुवाद → नीर में हंस है, हंस में कमल है, और कमल में स्वरस्वती माँ विराजती हैं।


साभार: पंडित ओमन सौभरि भुर्रक, गाँव-भरनाकलां, गोवर्धन, मथुरा(उत्तर प्रदेश) ।

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अखंड या बृहद भारत अर्थात वैदिक भारतवर्ष

 अखंड भारत अर्थात वैदिक भारतवर्ष:- 






आज की इस पीढ़ी को न तो वेदों के बारे में पता है न ही महाग्रंथों के बारे में और न ही पुराणों के बारे में। उपनिषद का तो नाम भी मुश्किल से ही सुना होगा।

भारत कोई 70 वर्ष पुराना देश नहीं है। यह हजारों वर्षों पुरानी एक सभ्यता है जिसकी पहचान भौगोलिक अवस्थिति से होती है। भारत के रहने वाले इतने पुराने है कि इसे सनातन यानि जो सदा से यानि अविरल समय से चला आ रहा है।

विष्णु पुराण में स्पष्ट लिखा है :-

उत्तरं यत समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणं।

वर्ष तद भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः।।

इसका अर्थ यह है कि “समुद्र के उत्तर से ले कर हिमालय के दक्षिण में जो देश है वही भारत है और यहाँ के लोग भारतीय हैं ।

ब्रह्म पुराण, अध्याय 18 में जम्बूद्वीप के महान होने का प्रतिपादन है-

तपस्तप्यन्ति यताये जुह्वते चात्र याज्विन।।

दानाभि चात्र दीयन्ते परलोकार्थ मादरात्॥ 21॥

पुरुषैयज्ञ पुरुषो जम्बूद्वीपे सदेज्यते।।

यज्ञोर्यज्ञमयोविष्णु रम्य द्वीपेसु चान्यथा॥ 22॥

अत्रापि भारतश्रेष्ठ जम्बूद्वीपे महामुने।।

यतो कर्म भूरेषा यधाऽन्या भोग भूमयः॥23॥

अर्थात भारत भूमि में लोग तपश्चर्या करते हैं, यज्ञ करने वाले हवन करते हैं तथा परलोक के लिए आदरपूर्वक दान भी देते हैं। जम्बूद्वीप में सत्पुरुषों के द्वारा यज्ञ भगवान् का यजन हुआ करता है। यज्ञों के कारण यज्ञ पुरुष भगवान् जम्बूद्वीप में ही निवास करते हैं। इस जम्बूद्वीप में भारतवर्ष श्रेष्ठ है। यज्ञों की प्रधानता के कारण इसे (भारत को) को कर्मभूमि तथा और अन्य द्वीपों को भोग- भूमि कहते हैं।

 इसी तरह अगर शक्तिपीठों का भौगोलिक स्थिति देखे तो वे बलूचिस्तान से लेकर त्रिपुरा, कश्मीर से कन्याकुमारी / जाफना तक फैले हुए हैं। यह एक बनावटी स्थिति नहीं है।

इतना ही नहीं जब हम अपने घरों में पुजा अर्चना के दौरान संकल्प लेते है तो उस दौरान प्रयोग में लाया जाने वाला मंत्र भी यही कहता है, जम्बू द्वीपे भारतखंडे आर्याव्रत देशांतर्गते। इस पंक्ति में मनुष्य के रहने के स्थान तथा उसके बारे में जानकारी दी जाती है जो पूजा करा रहा है।

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🎇 Individed India {South Asian Association for Regional Cooperation (SAARC)}

1- अफगानिस्तान – अफगानिस्तान 350 इ.पू. तक भारत का एक अंग था। सातवीं शताब्दी में इस्लाम के आगमन के बाद अफगानिस्तान धीरे-धीरे राजनीतिक और बाद में सांस्कृतिक रूप से भारत से अलग हो गया।

2- पाकिस्तान – 15 अगस्त, 1947 के पहले पाकिस्तान भारत का एक अंग था।

3- बांग्लादेश – बांग्लादेश भी 15 अगस्त 1947 के पहले भारत का अंग था। देश विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान के रूप में यह भारत से अलग हो गया। 1971 में यह पाकिस्तान से भी अलग हो गया ।

4- नेपाल – विश्व का एक मात्र हिन्दू राज्य है, जिसका एकीकरण गोरखा राजा ने 1769 ई. में किया था। पूर्व में यह प्राय: भारतीय राज्यों का ही अंग रहा।

5- भूटान – प्राचीन काल में भूटान भद्र देश के नाम से जाना जाता था। 8 अगस्त 1949 में भारत-भूटान संधि हुई जिससे स्वतंत्र प्रभुता सम्पन्न भूटान की पहचान बनी।

5- म्यांमार (बर्मा) – अराकान की अनुश्रुतियों के अनुसार यहां का प्रथम राजा वाराणसी का एक राजकुमार था। 1852 में अंग्रेजों का बर्मा पर अधिकार हो गया। 1937 में भारत से इसे अलग कर दिया गया।

6- मालदीव - 

7- श्रीलंका – श्रीलंका का प्राचीन नाम ताम्रपर्णी था। श्रीलंका भारत का प्रमुख अंग था। 1505 में पुर्तगाली, 1606 में डच और 1795 में अंग्रेजों ने लंका पर अधिकार किया। 1935 ई. में अंग्रेजों ने लंका को भारत से अलग कर दिया।

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🎇 Indosphere- The Indosphere is a cultural, linguistic, and historical sphere of influence radiating from the Indian subcontinent, encompassing regions heavily shaped by Indian civilization, religions (Hinduism and Buddhism), the Sanskrit language, art, and philosophy. It extends from the Persian plateau in the west to Japan in the east, and across maritime Southeast Asia.

8- तिब्बत – तिब्बत का उल्लेख हमारे ग्रन्थों में त्रिविष्टप के नाम से आता है। यहां बौद्ध धर्म का प्रचार चौथी शताब्दी में शुरू हुआ। तिब्बत प्राचीन भारत के सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र में था। भारतीय शासकों की अदूरदर्शिता के कारण चीन ने 1957 में तिब्बत पर कब्जा कर लिया।

9- कम्बोडिया – प्रथम शताब्दी में कौंडिन्य नामक एक ब्राह्मण ने हिन्दचीन में हिन्दू राज्य की स्थापना की।

10- लाओस- 

11- थाईलैंड- 

12- सिंगापुर- 

13- वियतनाम – वियतनाम का पुराना नाम चम्पा था। दूसरी शताब्दी में स्थापित चम्पा भारतीय संस्कृति का प्रमुख केंद्र था। यहां के चम लोगों ने भारतीय धर्म, भाषा, सभ्यता ग्रहण की थी। 1825 में चम्पा के महान हिन्दू राज्य का अन्त हुआ।

14- मलेशिया – प्रथम शताब्दी में साहसी भारतीयों ने मलेशिया पहुंचकर वहां के निवासियों को भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति से परिचित करवाया। कालान्तर में मलेशिया में शैव, वैष्णव तथा बौद्ध धर्म का प्रचलन हो गया। 1948 में अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हो यह सम्प्रभुता सम्पन्न राज्य बना।

15- इण्डोनेशिया – इण्डोनेशिया किसी समय में भारत का एक सम्पन्न राज्य था। आज इण्डोनेशिया में बाली द्वीप को छोड़कर शेष सभी द्वीपों पर मुसलमान बहुसंख्यक हैं। फिर भी हिन्दू देवी-देवताओं से यहां का जनमानस आज भी परंपराओं के माध्यम से जुड़ा है।

17- ब्रूनेई- 

17- फिलीपींस – फिलीपींस में किसी समय भारतीय संस्कृति का पूर्ण प्रभाव था । आज भी फिलीपींस में कुछ हिन्दू रीति-रिवाज प्रचलित हैं।

साभार: पंडित ओमन सौभरि भुर्रक, गाँव-भरनाकलां, गोवर्धन, मथुरा(उत्तर प्रदेश) ।

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