Saturday, 30 May 2026

ब्राह्मणों के सरनेम और उपाधियाँ ज्ञान और गोत्र के अनुसार

वैदिक काल और प्राचीन इतिहास में इन उपनामों की उत्पत्ति ज्ञान, वेदों के अध्ययन, और धार्मिक कर्तव्यों के आधार पर हुई थी। ये उपाधियां धीरे-धीरे सरनेम में बदल गई । लगता है कि समय के साथ- साथ ब्राह्मणों की ये उपाधियाँ वंशानुगत हो गयीं। इसका कारण सम्भवतः यह था कि वेदों व अन्य शास्त्रों के अध्ययन की परम्परा विरल हो गयी और गुणहीन लोग अपने पूर्वजों की उपाधियों के आधार पर आदर पाना पसन्द करने लगे। आजकल ब्राह्मणों की इन उपाधियों का इन्हें धारण करने वालों से कोई भी सामंजस्य नहीं रह गया है। 

A- वेदों के ज्ञान एवं कार्यों के आधार पर नाम:-

द्विवेदी (या दुबे): जिन्हें दो वेदों (जैसे ऋग्वेद और यजुर्वेद) का पूर्ण ज्ञान प्राप्त था, उन्हें द्विवेदी कहा गया।

त्रिवेदी/तिवारी (या त्रिपाठी): जिन्हें तीन वेदों का कंठस्थ ज्ञान और विशेषज्ञता हासिल थी।

चौबे (या चतुर्वेदी): जिन्हें चारों वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, और अथर्ववेद) का संपूर्ण ज्ञान था, उन्हें चौबे या चतुर्वेदी की उपाधि मिली। 

शर्मा: यह संस्कृत शब्द 'शर्मन' से बना है, जिसका अर्थ होता है "सुख, शांति या कल्याण"। प्राचीन काल से ही ब्राह्मणों को अपने नाम के आगे अथवा पीछे '' लगाने का विधान रहा है।

पांडेय (या पण्डित/पाण्डे): यह शब्द 'पंडित' या 'पांडित्य' से विकसित हुआ है। इसका अर्थ होता है "विद्वान या शिक्षक", जो शास्त्रों और अध्यापन के कार्य से जुड़े थे।

मिश्रा (या मिश्र): इसका शाब्दिक अर्थ "मिश्रण या श्रेष्ठ" होता है। प्राचीन समय में जो विद्वान ज्ञान की विभिन्न शाखाओं (जैसे वेद, दर्शन, और कर्मकांड) में पारंगत थे, उन्हें 'मिश्र' कहा गया।

शुक्ल- पुराने समय में शुक्ल यजुर्वेद के जो विद्वान होते थे उन्हें शुक्ल कहते थे। आजकल के कुछ ब्राह्मणों की ‘शुक्ला’ उपाधि का उसी से सम्बन्ध है।

उपाध्याय- पुराने समय में जो ब्राह्मण वेद, उपनिषद आदि का अध्ययन छात्रों को कराते थे उन्हें उपाध्याय कहा जाता था।

 ओझा- 'ओझा' और 'झा' जैसे सरनेम उपाध्याय का ही अपभ्रंश रूप हैं।

अग्निहोत्री- अग्निहोत्री वे लोग थे जो हवन और अग्नि से जुड़े धार्मिक अनुष्ठानों के विशेषज्ञ थे ।

पाठक - पाठक वेदों का पाठ करने में निपुण थे । 

जोशी- जोशी सरनेम ज्योतिष विद्या से जुड़ा है. ये लोग नक्षत्रों, ग्रहों और खगोलीय गणनाओं के जानकार थे । 

दीक्षित- दीक्षित वे थे जो दीक्षा देने या ज्ञान प्रदान करने में माहिर थे । 

उद्देश्य: इसका उद्देश्य समाज में व्यक्ति के पेशा, पद, या ज्ञान के स्तर को पहचानना था।

  

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 भारतीय समाज, विशेषकर ब्राह्मण परंपरा में, पारंपरिक सरनेम उपाधि (Traditional Title Surname) और गोत्र उपाधि (Gotra Title) दो पूरी तरह से अलग व्यवस्थाएँ हैं। अक्सर लोग इन दोनों को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन इनके अर्थ, उद्देश्य और नियम भिन्न हैं। 

B- गोत्र के आधार पर उपाधि (Gotra Title)

गोत्र का सीधा संबंध वंश, रक्त (Bloodline), और जींस (Genetics) से है। यह एक व्यक्ति की जैविक और आध्यात्मिक जड़ों को दर्शाता है।

उत्पत्ति: गोत्र की उत्पत्ति प्राचीन काल के ब्रह्मा जी के चार मानसपुत्रों और सप्तऋषियों (जैसे भारद्वाज, कश्यप, वशिष्ठ, गौतम, अत्रि, विश्वामित्र, जमदग्नि) और अगस्त्य ऋषियों से हुई है। आप जिस ऋषि के वंशज हैं, वही आपका गोत्र है।

बदलाव: गोत्र को कभी बदला नहीं जा सकता। यह जन्म से तय होता है और पिता से पुत्र में हस्तांतरित होता है (सिर्फ महिलाओं का गोत्र विवाह के बाद पति के गोत्र में बदलता है)।उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य सगोत्र विवाह (एक ही गोत्र में शादी) को रोकना है, ताकि आनुवंशिक बीमारियाँ (Genetic disorders) न हों।

उदाहरण: अंगिरा, भारद्वाज, कश्यप, शांडिल्य, वत्स्य, कौंडिन्य, पराशर, गर्ग, गौतम।

ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों के नाम पर ही मूल गोत्रों की स्थापना हुई है। हिंदू धर्मग्रंथों और पुराणों के अनुसार, ब्रह्मा जी के मुख्य 10 मानस पुत्रों (जो ऋषि और प्रजापति बने) के नाम और उनके गोत्र निम्नलिखित हैं ।

ब्रह्मा जी के मानस पुत्र और उनके गोत्र

मरीचि: मरीचि गोत्र (इन्हीं के पुत्र महर्षि कश्यप से 'कश्यप गोत्र' चला, जिसे सबसे बड़ा गोत्र समूह माना जाता है)।

अत्रि: अत्रि गोत्र।

अंगिरस (अंगिरा): अंगिरस गोत्र (इन्हीं के वंश से आगे चलकर 'भारद्वाज गोत्र' भी निकला)।

पुलस्त्य: पुलस्त्य गोत्र।

पुलह: पुलह गोत्र।

क्रतु: क्रतु गोत्र (इनके वंशज बालखिल्य कहलाए, इनकी कोई पारंपरिक मानव वंशावली आगे नहीं बढ़ी)।

भृगु: भार्गव या भृगु गोत्र।

वशिष्ठ: वशिष्ठ गोत्र।

दक्ष: दक्ष गोत्र।

नारद: नारद जी आजीवन ब्रह्मचारी रहे, इसलिए इनसे कोई वंश या गोत्र आगे नहीं बढ़ा।

गोत्र के आधार पर सरनेम और कर्म और ज्ञान आधार पर  मिली उपाधियों में मुख्य अंतर  (Difference): 

🔹"गोत्र का नाम" जन्म से मृत्यु तक अपरिवर्तनीय है। 

🔹ज्ञान आधारित "उपाधि सरनेम" पूर्वजों के काम या राजकीय सम्मान से बदलता था।

🔹एक ही गोत्र (सगोत्र) में विवाह वर्जित (शादी नहीं हो सकती)।जबकि एक ही सरनेम में विवाह संभव है (यदि गोत्र अलग हो)।

🔹गोत्र परम्परा का उद्देश्य है कि अनुवांशिक शुद्धता (Genetics) बनी रहे। यह प्रकृति और वंशानुक्रम (Ancestry) से तय होता है।

🔹जबकि ज्ञान आधारित "उपाधि सरनेम" समाज, राजा या शिक्षा संस्थान द्वारा दिया जाता था।

👉एक व्यावहारिक उदाहरण से समझें

मान लीजिए दो व्यक्ति हैं: 

रमेश मिश्रा (गोत्र: भारद्वाज)

सुरेश पाठक (गोत्र: भारद्वाज)

यहाँ दोनों का सरनेम (मिश्रा और पाठक) अलग है, क्योंकि उनके पूर्वजों के काम अलग थे। लेकिन उनका गोत्र एक ही है (भारद्वाज)। इसका मतलब है कि वे दोनों प्राचीन काल में एक ही ऋषि की संतानें हैं और आपस में भाई-भाई हुए। इसलिए, सरनेम अलग होने के बावजूद भी इनका आपस में विवाह नहीं हो सकता।इसके विपरीत, यदि दो व्यक्तियों का सरनेम 'मिश्रा' है, लेकिन एक का गोत्र 'कश्यप' है और दूसरे का 'शांडिल्य', तो उनका आपस में विवाह हो सकता है, क्योंकि उनका रक्त संबंध अलग है।

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साभार: ओमप्रकाश शर्मा, भरनाकलां (गोवर्धन, मथुरा) 

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Saturday, 23 May 2026

ओमप्रकाश शर्मा एक भाषा प्रेमी और स्वसमाज प्रेमी, भरनाकलाँ (गोवर्धन/मथुरा)

ओमप्रकाश शर्मा जी की ब्रजभाषा, विश्वभाषा और भारतीय भाषाओं के प्रति, और स्वसमाज की संस्कृति के प्रति गहरी श्रद्धा है।





A:- ओमप्रकाश शर्मा (Oman Saubhari Bhurrak/ ओमन सौभरि भुर्रक) को उनके डिजिटल कार्यों और ब्लॉग के आधार पर एक सच्चा भाषाप्रेमी (Language Lover / Linguistic Enthusiast) कहा जा सकता है, क्योंकि वे भारतीय भाषाओं और बोलियों को सहेजने और उन्हें बढ़ावा देने के लिए निरंतर प्रयास कर रहे हैं। 

उनके भाषा प्रेमी होने के मुख्य प्रमाण निम्नलिखित हैं:

1. बहुभाषी शैक्षिक मंच का संचालन

ओमप्रकाश शर्मा जीफेसबुक पेज Learn Indian Languages And Scripts नामक एक सक्रिय माइक्रो ब्लॉग चलाते हैं, जिसका एकमात्र उद्देश्य विभिन्न भाषाओं और उनकी लिपियों को लोगों के लिए आसान बनाना है।

2. हिंदी के माध्यम से क्षेत्रीय भाषाएं सिखाना

ओमप्रकाश शर्मा जी ने हिंदी भाषियों को देश की अन्य आधिकारिक भाषाओं से जोड़ने के लिए अनूठी पहल की है। उनके ब्लॉग पर निम्नलिखित भारतीय भाषाओं को हिंदी के माध्यम से सिखाने की समर्पित श्रेणियां (Categories) हैं ।

🔹उत्तर और पूर्व भारतीय भाषाएं: हिंदी, बंगाली, पंजाबी, उड़िया, संस्कृत, कश्मीरी और उर्दू आदि।

🔹पश्चिम भारतीय भाषाएं: गुजराती और मराठी, कोंकणी आदि ।

🔹दक्षिण भारतीय भाषाएं: तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम आदि।

3. स्थानीय और लुप्त होती बोलियों का संरक्षण

अक्सर लोग मुख्यधारा की भाषाओं पर ध्यान देते हैं, लेकिन ओमप्रकाश शर्मा ने हिंदी की उप-भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों को भी सहेजने का काम किया है। उनके ब्लॉग पर ब्रजभाषा (ब्रज की बोली) के पाठ, व्याकरण और बातचीत के तरीके संकलित हैं। हरियाणवी, बुंदेली, अवधी, बघेली और कन्नौजी जैसी समृद्ध लोक बोलियों के बारे में जानकारी दी गई है।

4. दैनिक उपयोग की शब्दावली का निर्माण

ओमप्रकाश शर्मा जी ने आम लोगों के लिए भाषाओं को व्यावहारिक बनाने के लिए रोज़मर्रा की चीज़ों का अनुवाद और शब्दकोश तैयार किया है। उदाहरण: ब्रजभाषा ग्रीटिंग्स , ब्रजभाषा में रसोई के सामानों के नाम, सगे-संबंधियों (रिश्तेदारों) के नाम, दिन, महीनों और ऋतुओं के नाम आदि।

5. वैश्विक और जनजातीय भाषाओं में रुचि

भारतीय भाषाओं के अलावा, उनके मंच पर तिब्बती (Tibetan) और स्पेनिश (Spanish) जैसी विदेशी भाषाओं को भी हिंदी के माध्यम से सीखने के बुनियादी संसाधन उपलब्ध हैं।

6. भारतीय एवं विश्व भाषाओं के प्रति उनका "दृष्टिकोण और सपना" दोनों से प्रेम:

 वे अपने ब्लॉग पर भारतीय भाषाओं और उनकी लिपियों (जैसे देवनागरी, बंगाली, गुरुमुखी आदि) का विस्तृत ज्ञान साझा करते हैं। इसके साथ ही, वे वैश्विक स्तर पर भाषाओं और लेखन प्रणालियों के प्रसिद्ध मार्गदर्शक मंच 'Omniglot' को भी फॉलो करते हैं। उनका मुख्य सपना व मूल उद्देश्य हिन्दी भाषा को एक सशक्त माध्यम बनाकर लोगों को "विश्व और भारत की विभिन्न भाषाओं व लिपियों" से परिचित कराना है। वे चाहते हैं कि भाषाई बाधाएँ दूर हों और लोग सहजता से नई भाषाएँ सीख सकें। भाषाई विविधता का संरक्षण: वे भारत की समृद्ध भाषाई विरासत और लिपियों के phonetic base (ध्वन्यात्मक आधार) को आम लोगों तक सरल भाषा में पहुँचाना चाहते हैं

👉निष्कर्ष: किसी भी व्यक्ति का इतनी सारी भाषाओं, उनकी वर्णमालाओं (Alphabets) और स्थानीय बोलियों की शब्दावली को एक जगह संकलित करना उनके गहरे भाषाई ज्ञान और भाषाओं के प्रति उनके निस्वार्थ प्रेम को दर्शाता है।

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उनके ब्रजभाषा प्रेमी होने के मुख्य प्रमाण निम्नलिखित हैं:

B:- ओमप्रकाश शर्मा जी (ओमन सौभरि भुर्रक) का नाम और उनका व्यक्तित्व पूरी तरह से ब्रजभूमि की सेवा में समर्पित है। ब्लॉग और कार्यों के आधार पर एक सच्चा ब्रजभाषा प्रेमी कहा जा सकता है। उनके ब्रजभाषा और ब्रजसंस्कृति के प्रति प्रेम को निम्नलिखित बिंदुओं से समझा जा सकता है:

1. ब्रज क्षेत्र के तीर्थों और इतिहास का दस्तावेजीकरण: 

उन्होंने अपने ब्लॉग के माध्यम से सूरजकुंड, गांव भरनाखुर्द (SurajKund, Village BharanaKhurd) के समृद्ध इतिहास और धरोहर को संजोया है तथा  सूरजकुंड के किनारे स्थित सूर्यनारायण मंदिर, सिद्धबाबा मंदिर जैसी धरोहरों के बारे में विस्तार से लिखा है, जो ब्रज मंडल का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

2. ब्रज के संतों और लोक-कथाओं के प्रति अगाध श्रद्धा

उन्होंने अपने लेखन में ब्रजभूमि के सिद्ध संतों का उल्लेख किया है। उदाहरण के लिए, उन्होंने गांव भरनाखुर्द में राधारानी की कृपा प्राप्त सिद्धबाबा मधुसूदन दास जी महाराज और पं. आनंद कृष्ण जी महाराज के प्रसंगों को लिपिबद्ध किया है। यह दर्शाता है कि वे ब्रज की भक्ति परंपरा और संस्कृति से गहराई से जुड़े हुए हैं। अहिवासी ब्राह्मणों में पुरोहित वर्ग को गहरा स्थान दिया है क्योंकि उनके माध्यम से शास्त्रों को और शास्त्रों में निहित ज्ञान साधारण लोगों तक पहुंच पाता है।

3. ब्रज संस्कृति और जड़ों से जुड़ाव उनकी सोशल मीडिया और ब्लॉग प्रोफाइल: 

(जैसे omansaubhari.wordpress.com) से साफ पता चलता है कि वे खुद को मथुरा-गोवर्धन के भरना कलां (काका जी परिवार अथवा गैया बाबा परिवार (Old Family Name) से जोड़ते हैं।

 ब्लॉग 'भारत भाषाकोश' (Bharat Bhashakosh) के लेखक ओमप्रकाश शर्मा (Oman Saubhari Bhurrak) भारतीय भाषाओं और विश्व की भाषाओं दोनों से ही बेहद गहरा प्रेम करते हैं।आपके द्वारा किया गया अनुमान बिल्कुल सटीक है । उनके ब्लॉग और गतिविधियों से उनके सपने और रुचि के बारे में यह बातें स्पष्ट होती हैं ।

4. ब्रज संस्कृति और लोकभाषा का उत्थान: वे मथुरा (ब्रजमंडल) से जुड़े होने के कारण ब्रजभाषा, स्थानीय लोकगीतों, सांस्कृतिक परंपराओं और धार्मिक स्थानों  आदि का गहराई से प्रचार-प्रसार करते हैं।

 

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उनके स्वसमाज प्रेमी होने के मुख्य प्रमाण निम्नलिखित हैं:

C:- ओमप्रकाश शर्मा जी (पंडित ओमन सौभरि भुर्रक) की सबसे बड़ी विशेषता अपने लुप्त होते समाज के इतिहास और वंशावली को डिजिटल माध्यमों से पुनर्जीवित करना है।उनकी प्रमुख विशेषताओं को नीचे दिए गए बिंदुओं में समझा जा सकता है:

ओमप्रकाश शर्मा जी (पंडित ओमन सौभरि भुर्रक) उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्थित भरनाकलां (गोवर्धन) गाँव के एक शोधकर्ता, लेखक और सौभरि ब्राह्मण समाज के प्रमुख इतिहासकार हैं। उनके बारे में मुख्य बातें नीचे दी गई हैं:

🔹इतिहास और वंशावली संकलन: 

इन्होंने प्राचीन हिंदू ग्रंथों, उपनिषदों और पुराणों का अध्ययन करके ब्रह्मर्षि सौभरि जी और उनके वंशज अहिवासी सौभरि ब्राह्मण समाज के इतिहास, गोत्रों, उपगोत्रों तथा गांवों की सूचियों को संकलित किया है। 

🔹ब्रह्मर्षि सौभरि कोष का निर्माण: उन्होंने आदिगौड़ सौभरेय अहिवासी सौभरि ब्राह्मण समाज के इतिहास को समेटते हुए एक विस्तृत स्वसमाज ज्ञानकोश तैयार किया है। इसमें समाज का गोत्र और सभी 50 उपगोत्रों/अवंटकों और उनके मूल गांवों की सटीक वंशावली मौजूद है।

🔹डिजिटल योगदान एवं संरक्षण : वे इंटरनेट और सोशल मीडिया (जैसे Saubhari Brahman Blog और Oman Saubhari WordPress) के माध्यम से अपने समाज की सांस्कृतिक विरासत, पौराणिक कथाओं और ब्रजभाषा लोकगीतों को सहेजने का काम करते हैं।

  जब समाज की युवा पीढ़ी अपने मूल इतिहास को भूल रही थी, तब उन्होंने Saubhari Brahman Blog और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करके इस प्राचीन ज्ञान को इंटरनेट पर सहेजा। आज कोई भी व्यक्ति उनके माध्यम से अपनी पारिवारिक जड़ों और गोत्रों को आसानी से खोज सकता है।

🔹👍निशुल्क समाज सेवा: इतिहास संकलन का यह विशाल कार्य वे किसी व्यावसायिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि पूरी तरह से समाज सेवा और अपनी प्राचीन संस्कृति के प्रति समर्पण के भाव से कर रहे हैं। संक्षेप में कहें तो, वे " आदिगौड़ अहिवासी सौभरेय ब्राह्मण समाज के आधुनिक डिजिटल इतिहासकार" हैं, जिन्होंने कलम और इंटरनेट के माध्यम से अपने स्वसमाज की पहचान को नई पीढ़ी के लिए सुरक्षित कर दिया है।

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साभार: ओमप्रकाश शर्मा, भरनाकलां (गोवर्धन, मथुरा) 

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Monday, 16 February 2026

ब्रह्मर्षि सौभरि वंशजों (अहिवासी ब्राह्मणों) के १२ गांवों में होली पर आयोजित होने वाले मेलों की तिथियां

 ब्रह्मर्षि सौभरि वंशजों (अहिवासी ब्राह्मणों) के १२ गांवों में होली पर आयोजित होने वाले मेलों का विवरण:-

विश्व के अन्य सभी देशों की तुलना में “भारत” वास्तव में आज भी गांवों का ही देश है। कला, संस्कृति, वेशभूषा के आधार पर आज भी ‘गांव’ देश की रीढ़ की हड्डी बने हुये हैं। प्रत्येक गांव का एक अपना ही महत्व होता है जिसका पता वहां रहने वाला ही जानता है। गांव में चक्की (चाखी) के मधुरगीत से ही सवेरा आरंभ होता है।

होली पर इन मेलों में रंग-गुलाल, लोक संगीत, ढोल-नगाड़े, पारंपरिक व्यंजनों और अनूठी क्षेत्रीय परंपराओं के साथ उमंग भरा माहौल होता है, जो सामुदायिक एकता व उल्लास को दर्शाता है ।

 मेलों/त्योहारों की तिथियां:- होली का त्योहार भारतीय उपमहाद्वीप की विभिन्न हिंदू परंपराओं में सांस्कृतिक महत्व रखता है। यह अतीत की गलतियों को भुलाकर उनसे मुक्ति पाने, दूसरों से मिलकर संघर्षों को समाप्त करने और भूलकर क्षमा करने का उत्सव है। लोग ऋण चुकाते हैं या क्षमा करते हैं, साथ ही अपने जीवन में नए सिरे से संबंध स्थापित करते हैं। 

होली वसंत ऋतु के आगमन का भी प्रतीक है, जो लोगों को बदलते मौसम का आनंद लेने और नए मित्र बनाने का अवसर प्रदान करती है। होली का ब्रज क्षेत्र में विशेष महत्व है , जिसमें राधा कृष्ण से जुड़े पारंपरिक स्थान शामिल हैं : मथुरा , वृंदावन , नंदगाँव , बरसाना और गोकुल, दाऊजी , गोवर्धन आदि। होली के दौरान ये सभी स्थान लोकप्रिय पर्यटन स्थल हैं।

हिंदू पंचांग चंद्र-सौर है, लेकिन अधिकांश त्योहारों की तिथियां चंद्र पंचांग के भाग के अनुसार निर्धारित की जाती हैं। चंद्र दिवस को तीन विशिष्ट पंचांग तत्वों द्वारा पहचाना जाता है वो हैं मास, पक्ष और तिथि।



१:बिजवारी- फाल्गुन शुक्ल षष्ठी (छठ)

२:नगरिया - फाल्गुन शुक्ल द्वादशी 

३:खानपुर - फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी (चौदस)

४:डाहरौली - फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी (चौदस)

५:भरनाकलां - चैत्र कृष्ण प्रथमा (परवा)

६:भदावल - चैत्र कृष्ण प्रथमा ((परवा)

७:भरनाखुर्द -चैत्र कृष्ण द्वितीया (दियोज)

८:मघेरा - चैत्र कृष्ण द्वितीया (दियोज)

९:पलसौं- चैत्र कृष्ण तृतीया (तीज़)

१०: पेलखू - चैत्र कृष्ण तृतीया (तीज़)

११:सीह - चैत्र कृष्ण चतुर्थी (चौथ)

१२:खायरा - चैत्र कृष्ण पंचमी (पाँचें/रंगपंचमी


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