Brahmrishi Saubhari Ji: Master of the yamuna water Meditation-




ऋषियों को वेदों ने प्रजापति के अंग-भूत की संज्ञा दी है उन्हें जन्म से ही सच्चे धर्म का ज्ञान था एवं आचरण भी उसी के अनुरूप होता था। वे त्रिकालदर्शी होते थे। सतयुग के उन्हीं श्रेष्ठ ऋषियों में थे ब्रह्मर्षि सौभरि। ब्रह्मा जी के पौत्र महर्षि घोर के पौत्र ब्रह्मर्षि सौभरि मंत्रद्रष्टा महर्षि कण्व के पुत्र थे।
सदैव तपस्या में लीन रहने वाले ऋषि कण्व का रमणीक आश्रम था जहां शिष्यों की शिक्षा-दीक्षा अनवरत चलती रहती थी। उस काल में वृत्तासुर का आतंक संत-महात्माओं के लिए कष्टदायक बना हुआ था। उसने इन्द्र से इन्द्रासन बलपूर्वक छीन लिया था। वृत्तासुर को भस्म करने के लिए इन्द्र ने महर्षि दधीचि से प्रार्थना की तथा उनकी अस्थियां प्राप्त कर बज्र बनाया और वृत्तासुर को मार दिया। वृत्तासुर के भस्म होने के बाद बज्र सृष्टि को भी अपने तेज से जलाने लगा। इस समाचार को नारद जी ने भगवान विष्णु से कहा और सृष्टि की रक्षा हेतु निवेदन किया। भगवान विष्णु ने नारद जी को बताया कि जहां एक ओर बज्रमें नष्ट करने की शक्ति है; तो दूसरी ओर सृजन करने की विलक्षण क्षमता भी है। विष्णु जी ने नारद जी से भूमण्डल पर महर्षि दधीचि के समकक्ष किसी तपस्वी ऋषि का नाम बताने को कहा। नारद ने महर्षि कण्व की प्रशंसा करते हुए उन्हीं का नाम इस हेतु प्रस्तावित किया। भगवान विष्णु महर्षि कण्व के आश्रम पर पहुंचे और बज्र के तेज को ग्रहण करने का आग्रह किया। ऋषिश्रेष्ठ ने सृष्टि के कल्याण के लिए उस तेज को ग्रहण करना स्वीकार किया। विष्णु भगवान ने कहा कि बज्रका तेज संहारक के साथ-साथ गर्भोत्पादक भी है। कुछ दिनों बाद ऋषि पत्नी गर्भवती हुई। पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। ये ही आगे चलकर तपोधन ब्रह्मर्षि सौभरि हुए।
बालक सौभरि ने पिता महर्षि कण्व से तत्वमसि का ज्ञान प्राप्त किया। ऋषि कण्व ने उन्हें सबका मूल सत् बताया। जगत का ईश्वर हमारी अपनी ही अन्तरात्मा स्वरूप है उसे दूरवर्ती कहना ही नास्तिकता है। ऋषि ने आगे कहा-वत्स! जगत की अनन्त शक्ति तुम्हारे अन्दर है। मन के कुसंस्कार उसे ढके हैं, उन्हें भगाओ, साहसी बनो, सत्य को समझो और आचरण में ढालो। महर्षि कण्व पुन:बोले-पुत्र! जैसे समुद्र के जल से वृष्टि हुई वह पानी नदी रूप हो समुद्र में मिल गया।नदियां समुद्र में मिलकर अपने नाम तथा रूप को त्याग देती हैं; ठीक इसी प्रकार जीव भी सत् से निकल कर सत् में ही लीन हो जाता है। सूक्ष्म तत्व सबकी आत्मा है, वह सत् है। वह सत् तू ही है। तत्वमसि तत्वज्ञान प्राप्त कर एवं पिताजी से आज्ञा प्राप्त कर सबसे मिलकर हर्षित हो सौभरि वनगमन करते हैं।
ब्रह्मर्षि सौभरि सृष्टि के आदि महामान्य महर्षियों में हैं। ऋग्वेद की विनियोग परंपरा तथा आर्षानुक्रमणी से ज्ञात होता है कि ब्रह्मा से अंगिरा, अंगिरा से घोर, घोर से कण्व और कण्व से सौभरि हुए। इसके अनुसार सौभरि बहुऋचाचार्य महामहिम ब्रह्मा के पौत्र के पौत्र हुए। मान्यता है कि फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को इन्होंने जन्म ग्रहण किया। महर्षि सौभरि ६० हजार वर्ष तक यमुना हृद जहां ब्रज का कालीदह और वृन्दावन का सुनरख वन है, में समाधिस्थ हो तपस्या करते हैं। इन्द्रादिक समस्त देव उनकी परीक्षा के लिए ब्रह्मर्षि नारद को भेजते हैं। नारद जी भी सौभरिजी के तप एवं ज्ञान से प्रभावित हो वंदन करते हैं तथा सभी देवगण उनका पुष्प वर्षा कर अभिनंदन करते हैं। इधर अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट राजा मान्धाता वर्षा न होने के कारण राज्य में अकाल पडने से बहुत दुखी थे। अपनी सहधर्मिणी से प्रजा के कष्टों की चर्चा कर ही रहे थे; कि घूमते-घूमते नारद जी सम्राट मान्धाता के राजमहल में पधारे। सम्राट ने अपनी व्यथा नारद जी को निवेदित कर दी। नारद जी ने अयोध्या नरेश को परामर्श दिया कि वे शास्त्रों के मर्मज्ञ, यशस्वी एवं त्रिकालदर्शी ब्रह्मर्षि सौभरि से यज्ञ करायें। निश्चय ही आपके राज्य एवं प्रजा का कल्याण होगा। राजा मान्धाता नारद जी के परामर्श अंतर्गत ब्रह्मर्षि सौभरि जी के यमुना हृदस्थित आश्रम में पहुंचे तथा अपनी व्यथा कथा अर्पित की। महर्षि ने ससम्मान अयोध्यापति को आतिथ्य दिया और प्रात:काल जनकल्याणकारी यज्ञ कराने हेतु अयोध्यापति के साथ अयोध्या पहुंच जाते हैं।
यज्ञ एक माह तक अनवरत रूप से अपना आनंद प्रस्फुटित करता है और वर्षा प्रारम्भ हो जाती है। सम्राट दम्पति ब्रह्मर्षि को अत्यधिक सम्मान सहित उनके आश्रम तक पहुंचाने आये। ब्रह्मर्षि का अपनी तपस्या के अंतर्गत नैतिक नियम था कि आटे की गोलियां बनाकर मछलियों को प्रतिदिन भोज्य प्रदान किया करते थे। शरणागत वत्सल महर्षि सौभरि की ख्याति भी सर्वत्र पुष्पित थी। विष्णु भगवान का वाहन होने के दर्प में गरुड मछलियों एवं रमणकद्वीप के निवासी कद्रूपुत्र सर्पो को अपना भोजन बनाने लगा। सर्पों ने शेषनाग से अपना दुख सुनाया। शेषनाग जी ने शरणागत वत्सल ब्रह्मर्षि सौभरि की छत्रछाया में शरण लेने का परामर्श उन्हें दिया। कालियनाग के साथ पीडित सर्प सौभरिजी की शरणागत हुए। मुनिवर ने सभी को आश्वस्त किया तथा मछली एवं अहिभक्षी गरुड को शाप दिया कि यदि उनके सुनरख स्थित क्षेत्र में पद रखा तो भस्म हो जाएगा। इस क्षेत्र को ब्रह्मर्षि ने अहिवास क्षेत्र घोषित कर दिया। तभी से महर्षि सौभरि अहि को वास देने के कारण अहिवासी कहलाये। इस प्रकार उस स्थल में अहि,मछली तथा सभी जीव जन्तु, शान्ति पूर्वक निवास करते रहे।
तपस्या करते बहुत काल हो जाने पर भगवान विष्णु एक दिन ब्रह्मर्षि सौभरिजी के पास आकर निर्देश देते हैं कि सृष्टि की प्रगति के लिए ऋषि जी गृहस्थ धर्म में प्रवेश करें और इसके लिए नृप श्रेष्ठ मान्धाता के अन्त:पुर की एक कन्या से पाणिग्रहण करें। इच्छा न होने के बावजूद सृष्टि कल्याण के लिए भगवान विष्णु के निर्देशानुसार ब्रह्मर्षि सम्राट मान्धाता के यहां पहुंचे तो उनकी पचासों कन्याओं ने उनको वर बनाने की इच्छा जताई। कन्याओं का पाणिग्रहण वेद रीति से सौभरि के साथ कर दिया तथा अपार दहेज देकर उनके आश्रम अहिवास (सुनरख) को विदा किया। योग माया ने ब्रह्मर्षि के निर्देश पर सभी के लिए अलग-अलग आवासों की व्यवस्था कर दी। ब्रह्मर्षि सौभरि पत्नियों के साथ योग बल से रहते थे। एक दिवस मान्धाता पुत्रियों का कुशल-क्षेम जानने ब्रह्मर्षि के आश्रम आये। प्रत्येक पुत्री के प्रासाद में नृप को ब्रह्मर्षि मिलते तथा पुत्री सर्वथा आनन्दित। महर्षि ने राजा को काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अहंकार को त्यागने का उपदेश किया। ब्रह्मर्षि सौभरि के गुणवान एवं रूपवान पंच सहस्रपुत्र-पुत्रियां हुए तथा पौत्र-प्रपौत्र भी हुए जो अहिवासी कहलाये। एक दिन ब्रह्मर्षि को लगा कि उनका काम पूरा हो गया है और सभी पत्नियों एवं परिवार को बताकर पुन:तपस्या की ओर बढने की इच्छा हुई।
ऋषि पत्नियों ने भी ब्रह्मर्षि के साथ ही तपस्या में सहयोग करने का आग्रह किया। तपस्या में लीन हो प्रभु दर्शन कर समाधिस्थ हो गए। महर्षि का तपस्थल आज भी एक टीले के रूप में विद्यमान है जहां मंदिर में ब्रह्मर्षि सौभरि की पूजा होती है। भक्त उदार मन ब्रह्मर्षि की आराधना कर मनचाहा मनोरथ प्राप्त करते हैं।
आज भी उनके वंशज मथुरा, भरतपुर, अलवर, बरेली, सीतापुर, जबलपुर, होशंगाबाद, भिंड, मुरैना आदि जिलों गांव तथा नगर दोनों जगहों पर निवास करते हैं।
वर्तमान में १६० गांवों से भी अधिक गांवों में तथा ४- ५ राज्यों में निवास करते हैं।


ओमन सौभरि भुर्रक, भरनाकलां, मथुरा


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